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संघ गीत

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  संघ गीत  लक्ष्य तक पहुँचे बिना, पथ में पथिक विश्राम कैसा। लक्ष्य तक अति दूर दुर्गम मार्ग भी हम जानते हैं, किन्तु पथ के कंटकों को हम सुमन ही मानते हैं, जब प्रगति का नाम जीवन, यह अकाल विराम कैसा ।। लक्ष्य तक_______ । धनुष से जो छूटता है बाण कब मग में ठहरता देखते ही देखते वह लक्ष्य को ही वेध करता लक्ष्य प्रेरित बाण हैं हम, ठहरने का काम कैसा।। लक्ष्य तक_______ । बस ही है पथिक जो पथ पर निरन्तर अग्रसर हो, हो सदा गतिशील जिसका लक्ष्य प्रतिक्षण निकटतर हो। हार बैठे जो डगर में पथिक उसका नाम कैसा ।। लक्ष्य तक_______ । बाल रवि की स्वर्ण किरणें निमिष में भू पर पहुँचतीं, कालिमा का नाश करतीं, ज्योति जगमग जगत धरती ज्योति के हम पुंज फिर हमको अमा से भीति कैसा ।। लक्ष्य तक_______ । आज तो अति ही निकट है देख लो वह लक्ष्य अपना, तुम वीर शिवा के वंशज हो तुम वीर शिवा के वंशज हो,फिर रोष तुम्हारा कहाँ गया। बोलो राणा की संतानों,वह जोश तुम्हारा कहाँ गया।। ओ वीर तुम्हारे कदमों से,सारी धरती थर्राती थी सागर का दिल हिल जाता था,पर्वत की धड़कती छाती थी अब चाल में सुस्ती कैसी है,क्यों पाँव हैं डगमग डोल रहे। कुछ ...