Posts

Showing posts from June, 2022

हिन्दू साम्राज्य दिवस

Image
  हिन्दू साम्राज्य दिवस हिन्दू साम्राज्य दिवस के अवसर पर नागपुर में सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का उद्बोधन प्रतिवर्ष आनेवाले इस हिंदूसाम्राज्य दिनोत्सव का आज विशेष आयोजन है। अपना संघ कार्य 84 वाँ वर्ष पार करके 85 वें वाल में चल रहा है। इतना लम्बा समय कोई कार्य करते करते जब बीत जाता है, दो पीढियाँ बीत कर अब तीसरी पीढी काम कर रही है, तो जो कार्यक्रम है, जो आचार है, उसके पीछे विचार क्या है इस का फिर स्मरण करना आवश्यक रहता है। बिना विचार के केवल कर्मकांड जैसा हम कुछ करते रहें तो परिश्रम तो होता है, लेकिन उसका परिणाम नहीं निकलता। समय आगे चलता चला जाता है तो कई बातों के बारे में जानकारियाँ लुप्त हो जाती हैं। तो फिर मन में कई प्रकार के प्रश्न पैदा हो सकते हैं और उस के चलते उनका उत्तर अगर नहीं मिला तो जो उपयुक्त आचार है उस के बारे में अश्रद्धा उत्पन्न होने की भी संभावना रहती है। हिंदू साम्राज्य दिवस ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी यह छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का दिवस है। संघ ने इस उत्सव को अपना उत्सव क्यों बनाया इसका आज के वातावरण में जिन्हें ज्ञान नहीं है, जानकारी नहीं है, उन के मन में ...

सुभाषित

Image
  पिवन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः,  परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ भावार्थ - नदियाँ अपना पानी स्वयं  नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल अपने जल से उगा हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते । इसी प्रकार सत्पुरुष भी अपने सत्प्रयासों से प्राप्त लाभ/ उपलब्धि का भोग स्वयं नहीं करते। वास्तव में सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है ।     मनसि एकं,वचसि एकम् ,     कर्मणि एकं सदात्मनाम्। मनसि अन्यत्,वचसि अन्यत्, कर्मणि अन्यत्,दुरात्मनाम् ।।         ‌    ‌       भावार्थ:- अद्भुत नेतृत्व की क्षमता के धनी व्यक्ति मन में जो भी विचार करते हैं,वही कहते हैं और स्वयं भी उसका अनुपालन करते हैं। परन्तु स्वार्थी और निम्न स्वभाव वाले व्यक्ति मन में सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं। सार:-  प्रत्येक व्यक्ति को वही सोचना व कहना चाहिए, जिसका वह स्वयं अनुपालन करता हो।

श्री गुरु जी

Image
  पू. गुरुजी प्रेरक संस्मरण हर बाला देवी की प्रतिमा सन् 1949 की बात है, एक महिला अपनी आठ वर्षीय बालिका को लेकर श्रीगुरुजी के दर्शनार्थ आई और उससे बोली ‘गुरुजी के गले में पुष्पहार डालकर उनको नमस्कार करो। ‘पुष्पहार लेकर ज्यों ही बालिका श्री गुरुजी की ओर बढ़ी, त्यों ही श्री गुरुजी ने जल्दी से खड़ें होकर पुष्पहार उसके हाथों से ले लिया और बालिका के चरणों का स्पर्श किया। यह देखकर आश्चर्यचकित माता बोली- आपने यह क्या किया? मैं तो अपनी बच्ची को आपसे आशीर्वाद दिलाने लाई थी और एक आप है कि उसके चरण स्पर्श कर रहे हैं। श्री गुरुजी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- आपके लिए वह बच्ची होगी, परन्तु मेरे लिए तो वह साक्षात ‘‘माँ‘‘ है। *ताई, मैं जाऊं?* एक कठिन प्रसंग, किन्तु बाद में आया । उसी दिन श्री गुरुजी को कार्यार्थ प्रवास के लिये जाना था । डॉ. पांडे जी से पूछने पर उन्होंने कहा, “वैसे कहा जाय तो इस समय का संपूर्ण प्रवास क्रम ही स्थगित करना चाहिये । कम से कम आज तो आप मत जाईये । स्वास्थ्य इतना बिगड़ा हुआ है कि आगे क्या होगा इसका अंदाजा आज नहीं आ सकता। चाहे तो आप कल प्रस्थान करें, तब तक अंदाजा आ सकेगा ।” श...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ओर स्वयंसेवक

Image
  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ओर स्वयंसेवक  प्राचीन काल से चलते आए अपने राष्ट्रजीवन पर यदि हम एक सरसरी नजर डालें तो हमें यह बोध होगा कि अपने समाज के धर्मप्रधान जीवन के कुछ संस्कार अनेक प्रकार की आपत्तियों के उपरांत भी अभी तक दिखाई  देते हैं। यहाँ धर्म-परिपालन करनेवाले, प्रत्यक्ष अपने जीवन में उसका आचरण करनेवाले तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी व्यक्ति एक अखंड परंपरा के रूप में उत्पन्न होते आए हैं। उन्हीं के कारण अपने राष्ट्र की वास्तविक रक्षा हुई है और उन्हीं की प्रेरणा से राज्य-निर्माता भी उत्पन्न हुए हैं। उस परंपरा को युगानुकूल बनाएँ अत: हम लोगों को समझना चाहिए कि लौकिक दृष्टि से समाज को समर्थ, सुप्रतिष्ठित, सद्धर्माघिष्ठित बनाने में तभी सफल हो सकेंगे, जब उस प्राचीन परंपरा को हम लोग युगानुकूल बना, फिर से पुनरुज्जीवित कर पाएँगे। युगानुकूल कहने का यह कारण है कि प्रत्येक युग में वह परंपरा उचित रूप धारण करके खड़ी हुर्इ है। कभी केवल गिरि-कंदराओं में, अरण्यों में रहनेवाले तपस्वी हुए तो कभी योगी निकले, कभी यज्ञ-यागादि के द्वारा और कभी भगवद्-भजन करनेवाले भक्तों और संतों के द्वारा यह परंपर...