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Showing posts from May, 2022

अनकही कथा पुस्तक का विमोचन

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आज दिनांक 15/5/22 को विद्यालय में पुस्तक "अनकही कथा (स्वाधीनता संग्राम में पश्चिम उत्तर प्रदेश का योगदान )" का विमोचन कार्यक्रम हुआ | इस पुस्तक के संपादक डॉ प्रदीप कुमार जी एवं सह संपादक श्रीमान सतीश शर्मा जी है | कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री सुरेन्द्र सिंह जी (आई ० ए०एस०कमिश्नर मेरठ डिविजन , मुख्य वक्ता श्रीमान रघुवेंद्र तंवर जी (चेयरमैन आई० सी० एच० आर० नई दिल्ली ), जी के साथ कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ ए० के० अग्रवाल एवं अतिथि श्री नवीन जी व् सुशील जी ने इस पुस्तक का विमोचन किया | https://youtu.be/tUmy1Fhtx4s

दयालु लकड़हारा व चिडिया

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  दयालु लकड़हारा व चिडिया बहुत समय पहले किसी गाँव में राम नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह दूसराे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता। जीवाें के प्रति उसके मन में बहुत दया थी। एक दिन वह जंगल से लकड़ी इकट्ठी करने के बाद थक गया ताे थाेड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। तभी उसे सामने के पेड़ से पक्षियों के बच्चाें के ज़ाेर-ज़ाेर से चीं-चीं करने की आवाज़ सुनाई दी। उसने सामने देखा ताे डर गया। एक सांप घाेसले में बैठे चिड़िया के बच्चाें की तरफ बढ़ रहा था। बच्चे उसी के डर से चिल्ला रहे थे। रामू उन्हें बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा। सांप लकड़हारे के डर से नीचे उतरने लगा। उसी दाैरान चिड़िया भी लाैट आई। उसने जब रामू काे पेड़ पर देखा ताे समझा कि उसने बच्चाें काे मार दिया। वह रामू काे चाेच मार-मारकर चिल्लाने लगी। उसकी आवाज़ से और चिड़िया भी आ गईं। सभी ने रामू पर हमला कर दिया। बेचारा रामू किसी तरह पेड़ से नीचे उतरा। चिड़िया जब घाेसले में गई ताे उसके बच्चे सुरक्षित बैठे थे। बच्चाें ने चिड़िया काे सारी बात बताई ताे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह रामू से माफी मांगना चाहती थी और उसका शुक्रिया अदा करना चाहत...

कर्मफल

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कर्मफल    एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है। जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करन...

पर्यावरण हेतू पेड लगाए

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  पर्यावरण हेतू  पेड लगाए कौन कौन से पेड़ लगाएं कि ज्यादा लाभ हो और मेहनत सही दिशा में हो।स्कंदपुराण में एक सुंदर श्लोक है अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम् न्यग्रोधमेकम्  दश चिञ्चिणीकान्। कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।  अश्वत्थः =  पीपल 100% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है,पिचुमन्दः नीम 80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है  न्यग्रोधः वटवृक्ष 80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है चिञ्चिणी इमली 80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है कपित्थः कविट 80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है बिल्वः बेल 85% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है आमलकः आवला 74% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है आम्रः  आम 70% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है,उप्ति = पौधा लगाना | अर्थात् - जो कोई इन वृक्षों के पौधो का  रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करना पड़ेंगे। इस सीख का अनुसरण न करने के कारण हमें आज इस परिस्थिति के स्वरूप में नरक के दर्शन हो रहे हैं। अभी भी कुछ बिगड़ा नही है, हम अभी भी अपनी गलती सुधार सकते हैं। औऱ गुलमोहर,निलगिरी जैसे वृक्ष अपने देश के पर्यावरण के लिए घातक हैं। पश्चिमी देशों...

इच्छा मृत्यु

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  पिताजी श्री भंवरलाल जी मल्लावत ने प्राप्त की इच्छामृत्यु। बचपन से सुनते आ रहा था कि भीष्म पितामह ही एक ऐसे महापुरुष हुए थे जिन्होंने इच्छामृत्यु पायी थी। परंतु मैंने अपने जीवन काल में अपने ही परिवार में अपने पिताश्री भंवरलाल जी को इच्छामृत्यु प्राप्त करते हुए देखा है। मेरी उम्र २० वर्ष से भी कम की थी। पिताजी असाध्य रोग केंसर से पीड़ित थे। हम परिवारजनों को इसका आभास तक नहीं होने दिया और यही कहते रहे कि मेरे लीवर की पाचनशक्ति कुछ कमजोर हो गई है और इसीलिये मैं आयुर्वेदिक औषधि कालमेध एवं गौमूत्र का सेवन कर रहा हूँ।  ११ मई १९७६ की बात है। प्रातः ११ बजे का समय था। उनके आयुर्वेदिक चिकित्सक पं. गौवर्धन जी शास्त्री (वैद्यजी) घर पर पधारे। पिताजी लेटे हुए थे, वैद्यजी उनके पास आकर बैठ गये। पिताजी ने वैद्यजी को प्रणाम करते हुए कहा कि वैद्यजी आप तो पञ्चाङ्ग के अच्छे जानकार हैं, जरा पञ्चाङ्ग देखकर मेरे इस संसार से जाने का शुभ मुहूर्त निकाल दीजिये। वैद्यजी ने अपने थैले से पञ्चाङ्ग निकाला और देखते हुए कहा कि शुभ मुहूर्त तो परसों १३ मई इसी समय ११ बजे का है। पूर्णिमा का दिन भी है। पिताजी ने तुर...