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Showing posts from January, 2022

परिवर्तन

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  पिछले 20 वर्ष में सरकारी नौकरी का महत्व 75% घट गया है, क्योंकि सरकारी और निजी लगभग एक समान हो चुका है.. थोड़ा बहुत अंतर बचा है.. अब अगले 5 साल में 25% महत्व भी खत्म होगा.. (यहां मेरा मतलब सरकारी पद खत्म होने से नहीं है, सरकारी नौकरी का महत्व खत्म होने से है..) आज टेक्नोलॉजी का विस्तार तेजी से हो रहा है, मान लीजिए कल सरकार को किसी दूर दराज के गांव में एक बैंक का ऑफिस खोलने की आवश्यकता थी, यदि ऑफिस खुलता तो 10 लोगों को सरकारी नौकरी मिलती.. अब टेक्नोलॉजी के कारण सरकार को बैंक खोलने की जरूरत नहीं है.. घर बैठे ऑनलाइन अकाउंट खुलेगा, डिजिटल पेमेंट से लेन देन होगा.. इस तरह टेक्नोलॉजी ने 10 सरकारी नौकरी खत्म कर दी..  यही वजह है की मोदी सरकार स्किल इंडिया पर जोर दे रही है, क्योंकि आने वाले समय में आपका स्किल ही आपको रोजगार की गारंटी देगा..  टेक्नोलॉजी ऑफिस कल्चर खत्म कर ही रही है, आज निजी क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम होने लगा है.. एक न एक दिन अधिकांश ऑफिस कल्चर खत्म हो जायेगा.. सरकार को बस गिने चुने पदों पर भर्ती की आवश्यकता रहेगी जो कंप्यूटर/मोबाइल पर घर बैठकर केवल डाटा फीड करें...

परम पूजनीय सर संघचालक जी का उद्बोधन

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 परम पूजनीय सरसंघचालक जी श्री मोहन भागवत जी के अमूल्य विचार महामारी को परास्त करने के लिए । १.सात्वंना देना -जिन भी परिवारों ने अपने सदस्यों को खोया है उनको अपना मानसिक संबल अत्यंत ऊंचा रखना होगा, क्योंकि सभी परिचित, और उनके निकटतम प्रियजन लोग इस अथाह दुख की घड़ी में उनको सांत्वना ही दे सकते हैं । लेकिन वह इस विकट दुख की स्थिति से अपने मन को मजबूत कर कर ही बाहर आ सकते हैं। परिस्थितियां निश्चित रूप से कठिन है लेकिन प्रयास भी उसी अनुरूप ही चाहिए । २.मन को "पाज़िटिव" रखना ही रखना है, और इसी से तन कोरोना "नेगेटिव" हो पायेगा। ३. मन को मजबूत रखना ही होगा, थककर ,हारकर बैठना नहीं है। निराशा की परिस्थिति का निर्माण मन में नहीं होने देना, बल्कि मन को लड़ने की परिस्थिति के लिए तैयार करना है, कि कैसे इस महामारी से लड़ाई जीते, खुद भी ,और अपने आसपास के लोगों को भी जिताने में जो बन सके वह करें । ४. परिस्थितियां कठिन है, पर उसका सामना करना ही है,परम आदरणीय डॉ हेडगेवार जी के जीवन वृत का वृत्तांत , सरसंघचालक जी , उदाहरण स्वरूप सामने लाते हैं, कि अपने माता पिता को लगभग 100 साल पहले प्...

विश्वगत विकास

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  विश्वगत विकास अब तक हमने व्यक्ति के परिवार के साथ सम्बन्ध, समाज के साथ सम्बन्ध, राष्ट्र के साथ सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? इन सब सम्बन्धों के बारे में जाना। आज हम व्यक्ति के विश्व के साथ सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? इस बिन्दु को जानने का प्रयत्न करेंगे। इन सम्बन्धों को जानने से पूर्व विश्व के एक राष्ट्र की कथा को जानेंगे। हमारी मातृभूमि वापस कर दो! इस विश्व में द्वितीय महायुद्ध तक यहूदियों के देश का नामोनिशान नहीं था। अर्थात् ई.सन् 1944 तक विश्व में एक भी यहूदी राष्ट्र नहीं था। सर्वप्रथम सन् 1948 में एक यहूदी राष्ट्र अस्तित्व में आया। कुल 27 लाख वाले उस छोटे से राष्ट्र का नाम है, इजरायल। इजरायल की सफलता और उसकी सम्पन्नता का कारण इसके निवासी यहूदियों की गहन धर्मनिष्ठा है, जो सम्पूर्ण विश्व में एक आदर्श उदाहरण है। यहूदी अपने धर्म ग्रन्थों पर बहुत विश्वास रखते हैं। इसी प्रकार वे अपनी मातृभूमि और अपने आदर्शों की रक्षा हेतु निजी स्वार्थों का हँसते -हँसते बलिदान कर देते हैं। अर्थात् उनके लिए निजी स्वार्थों की तुलना में राष्ट्रहित सर्वोपरि है। उनका यह वैशिष्ट्य अपने आपमें अनूठा उदाहरण है। इसी ...