इच्छा मृत्यु

 


पिताजी श्री भंवरलाल जी मल्लावत ने प्राप्त की इच्छामृत्यु।

बचपन से सुनते आ रहा था कि भीष्म पितामह ही एक ऐसे महापुरुष हुए थे जिन्होंने इच्छामृत्यु पायी थी। परंतु मैंने अपने जीवन काल में अपने ही परिवार में अपने पिताश्री भंवरलाल जी को इच्छामृत्यु प्राप्त करते हुए देखा है। मेरी उम्र २० वर्ष से भी कम की थी। पिताजी असाध्य रोग केंसर से पीड़ित थे। हम परिवारजनों को इसका आभास तक नहीं होने दिया और यही कहते रहे कि मेरे लीवर की पाचनशक्ति कुछ कमजोर हो गई है और इसीलिये मैं आयुर्वेदिक औषधि कालमेध एवं गौमूत्र का सेवन कर रहा हूँ। 

११ मई १९७६ की बात है। प्रातः ११ बजे का समय था। उनके आयुर्वेदिक चिकित्सक पं. गौवर्धन जी शास्त्री (वैद्यजी) घर पर पधारे। पिताजी लेटे हुए थे, वैद्यजी उनके पास आकर बैठ गये। पिताजी ने वैद्यजी को प्रणाम करते हुए कहा कि वैद्यजी आप तो पञ्चाङ्ग के अच्छे जानकार हैं, जरा पञ्चाङ्ग देखकर मेरे इस संसार से जाने का शुभ मुहूर्त निकाल दीजिये। वैद्यजी ने अपने थैले से पञ्चाङ्ग निकाला और देखते हुए कहा कि शुभ मुहूर्त तो परसों १३ मई इसी समय ११ बजे का है। पूर्णिमा का दिन भी है। पिताजी ने तुरन्त कहा- अच्छा वैद्यजी तो अपना इस संसार से प्रस्थान परसों का ही तय है। वैद्यजी ने यह कहते हुए कि  हाँ, हाँ, ठीक है, ठीक है और उनकी नाड़ी तथा जीभ देखने लग गए।

१२ मई १९७६ को प्रातः पिताजी के परम मित्र एवं सहयोगी बलदेव प्रसादजी गनेड़ीवाल घर पर आये और उनसे स्वास्थ्य की जानकारी लेने लगे। पिताजी ने बलदेवजी से कहा- आज रात्रि में साक्षात परमेश्वर के दर्शन हुए और उन्होंने कल १३ मई को प्रातः ११ बजे इस लोक से प्रस्थान करने की सहमति दे दी है। बलदेवजी ने हंसकर कहा जैसा कि उनका स्वभाव ही था- भँवरजी आपने भगवान को यह क्यों नहीं कहा कि अभी बच्चे बहुत छोटे-छोटे हैं। किसी का विवाह भी नहीं हुआ है तथा काम-धन्धे में भी किसी को नहीं लगाया है। अभी थोड़े दिन रुक जाइये। पिताजी हाजिरजवाब थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि बलदेवजी आपके प्रश्न के दो उत्तर हैं। पहला तो आप व्यवसायी हैं इसलिये दरमुलाई करना जानते हैं लेकिन हम तो नौकरी पेशे वाले हैं सो हमने तो भगवान की आज्ञा मानकर हाँ कर दी है। दूसरा जहां तक बच्चों के काम-धंधे की बात है। मैने अपने ४६ वर्षों के जीवनकाल में ऐसे-ऐसे उदाहरण देखे हैं जिनके पुरखों ने करोड़ों, अरबों की संपत्ति अपने पीछे छोड़ी लेकिन उनके बच्चे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और भीख मांगने को मजबूर हैं तथा ऐसे परिवारों को भी देखा है जिनके पूर्वजों ने अपने पीछे कुछ भी संपत्ति नहीं छोड़ी लेकिन उनके बच्चे एवं परिवार सुखी जीवन-यापन कर रहे हैं। अतः आप निश्चिंत रहें। अपना प्रस्थान कल १३ मई को प्रातः ११ बजे तय है।

कार्यकर्ता निरंतर पिताजी से मिलने व उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने आते रहते थे। किसी कार्यकर्ता बन्धु ने पिताजी को बतलाया कि कल पूर्णिमा है तथा चंद्रग्रहण भी है। घाट के काम में विलंब होने से सूतक के दौरान लोग पुनः घर आकर भोजन नहीं कर पायेंगे। पिताजी ने आंखें बंदकर प्रभु का ध्यान किया और बोले- अपना प्रस्थान का समय ११ बजे के स्थान पर १० बजे का तय हो गया है। सभी उपस्थित कार्यकर्ताओं को आश्चर्य हुआ। पिताजी ने उसी समय यह भी निर्देश दिया कि बिना विलम्ब किये ठीक समय पर अंतिम यात्रा हेतु प्रस्थान करना है। हर तरफ चर्चा शुरू हो गई और अगले दिन के कार्यक्रम पर विचार-मंथन शुरू हो गया।


१३ मई १९७६ को प्रातःकाल ही अपने सहयोगी साथी श्री राधाकिशनजी केडिया जो रात भर उनके पास ही बैठे थे, को एक प्रारूप पकड़ा दिया और कहा कि यह मेरा मृत्यु प्रमाण-पत्र (Death certificate) का प्रारूप है। वैद्यजी के लेटरहेड पर लिखकर उनसे दस्तखत करवा लिजियेगा कारण कि वैद्यजी उस समय लिखने में असमर्थ रहेंगे। उसी समय मुझे बुलाकर समझाने लगे चिन्ता मत करना। परिवार का दायित्व तुम पर है इसलिये हिम्मत के साथ डटकर सारे कार्य करना है। संघ परिवार तुम्हारे साथ खड़ा है। चार व्यक्तियों का साथ सदैव रहेगा जिनमें श्री मगनीराम जी पसारी, श्री बलदेवप्रसाद जी गनेड़ीवाल, श्री जुगलकिशोर जी जैथलिया एवं श्री जगदीश प्रसाद जी शाह के नाम थे।


मैं पिताजी के पास ही बैठा था। उन्होंने कहा तुम एक काम करो। अपने घर के परिण्डे में जो ताम्बा का कलश पड़ा है वो साथ में ले जाओ और जगन्नाथ घाट पर जाकर गंगाजल भरकर ले आओ। साथ में गोबर, गौमूत्र, कुशा आदि भी लेते आना। गाड़ी ले जाओ और सारा कार्य करके शीघ्र लौट आना। आज्ञा पाकर मैं तुरन्त रवाना हुआ और सारा कार्य पूर्ण कर लौट आया।

पिताजी ने अपनी पोशाक धोती, बनियान व जनेऊ बदली। गले से रुद्राक्ष की माला को निकालकर बगल की कुर्सी पर भगवान श्रीकृष्ण के चित्र के सामने रख दी एवं प्रभु का स्मरण कर प्रणाम किया। बलदेवजी ने कहा- भँवरजी आपके शरीर में इतनी पीड़ा है। वस्त्र बदलने की क्या आवश्यकता है? पिताजी ने जवाब दिया- हम आस-पास के गांव में जाते हैं तो भी वस्त्र बदलते हैं। मैं तो हमेशा-हमेशा के लिए लम्बी यात्रा पर जा रहा हूँ। रुद्राक्ष अर्थी के साथ नहीं जानी चाहिये इसलिये प्रभु चरणों में समर्पित कर दी है। पिताजी ने मुझे बुलाकर कहा कि परिवार के सभी लोग जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ। पंडितजी को बुलाकर भोजन करवाओ। आज्ञानुसार पंडितजी को भोजन करवाया गया। पिताजी ने तिलक करके पोशाक, दक्षिणा एवं छाता भेंटकर प्रणाम किया। परिवार वाले सभी भोजन कर तैयार होकर आ गये। उन्होंने कहा मैं जा रहा हूँ, चिंता न करना क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है। एक न एक दिन जाना तय है। मेरे जाने के बाद संकीर्तन करना, रोना-धोना नहीं क्योंकि भगवान का कीर्तन करने से जाने वाले की आत्मा को शांति मिलती है। माँ ने भी उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन किया।

पिताजी मसण्ड का सहारा लेकर बैठ गए। वैद्यजी नाड़ी देख रहे थे। १० बजे का समय होने वाला था। पिताजी ने तुलसी, गंगाजल, दही आदि लिया और हरि स्मरण किया। शादी-विवाह में जैसे बारात आने के पूर्व की तैयारी में बारात के स्वागत, वरमाला, तोरण आदि के कार्य में लोग लग जाते हैं उसी प्रकार पिताजी की अन्तिम यात्रा की तैयारियां होने लगीं। जमीन पर गंगाजल का छिड़काव कर गोबर का लेप किया जाने लगा। पिताजी की आंखें तब तक खुली हुई थीं। वैद्यजी नाड़ी देखते-देखते कार्यकर्ताओं को इशारा कर रहे थे कि अब इन्हें पलंग से उतारकर धरती पर लेना है। लोग एकत्रित होने लगे। सभी अपनी व्यवस्थाओं में लग गए। अर्थी तैयार करने का दायित्व लिया राधेश्यामजी चौधरी ने। सामान जुटाने एवं श्मशान घाट की व्यवस्था शिवभगवानजी तोदी ने की। श्रीगोपालजी करवां ने कीर्तन प्रारम्भ किया। कार्यकर्ताओं ने उनके शरीर को गोबर के लेप पर लेटाया। पिताजी की आज्ञानुसार फटाफट तैयारी कर चित्तरंजन एवेन्यू, ताराचंद दत्त स्ट्रीट, चितपुर रोड होते हुए नीमतल्ला की ओर अंतिम संस्कार हेतु प्रस्थान किया गया। रास्तों में लोग शवयात्रा में शामिल होते गए और नीमतल्ला पहुंचते-पहुंचते हजारों की तादाद में लोग एकत्रित हो गए। श्मशान घाट की जमीन पर गंगाजल का छिड़काव कर उनकी देह को रखा गया। चारों तरफ जमीन पर लोग बैठ गए। अंत्येष्टि से पूर्व विश्व हिन्दू परिषद के श्री किशनलाल पाटोदिया ने वहां पर गीता पाठ किया। श्री श्रीगोपाल जी करवां ने 'राम धुन लागी, गोपाल धुन लागी' भजन गाना शुरू किया। चारों ओर का वातावरण भजन से गुंजायमान हो गया। विश्व हिन्दू परिषद के श्री  किशनलाल पाटोदिया ने वहां गीता पाठ किया। चिता सजाई गई। पिताजी के नश्वर शरीर को चिता पर अंत्येष्टि हेतु रखा गया। सभी उपस्थित लोगों ने प्रणाम कर नम आंखों से उन्हें विदाई दी।


-अरुण प्रकाश मल्लावत

(ज्येष्ठ पुत्र)


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