श्री गुरु जी
पू. गुरुजी प्रेरक संस्मरण हर बाला देवी की प्रतिमा सन् 1949 की बात है, एक महिला अपनी आठ वर्षीय बालिका को लेकर श्रीगुरुजी के दर्शनार्थ आई और उससे बोली ‘गुरुजी के गले में पुष्पहार डालकर उनको नमस्कार करो। ‘पुष्पहार लेकर ज्यों ही बालिका श्री गुरुजी की ओर बढ़ी, त्यों ही श्री गुरुजी ने जल्दी से खड़ें होकर पुष्पहार उसके हाथों से ले लिया और बालिका के चरणों का स्पर्श किया। यह देखकर आश्चर्यचकित माता बोली- आपने यह क्या किया? मैं तो अपनी बच्ची को आपसे आशीर्वाद दिलाने लाई थी और एक आप है कि उसके चरण स्पर्श कर रहे हैं। श्री गुरुजी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- आपके लिए वह बच्ची होगी, परन्तु मेरे लिए तो वह साक्षात ‘‘माँ‘‘ है। *ताई, मैं जाऊं?* एक कठिन प्रसंग, किन्तु बाद में आया । उसी दिन श्री गुरुजी को कार्यार्थ प्रवास के लिये जाना था । डॉ. पांडे जी से पूछने पर उन्होंने कहा, “वैसे कहा जाय तो इस समय का संपूर्ण प्रवास क्रम ही स्थगित करना चाहिये । कम से कम आज तो आप मत जाईये । स्वास्थ्य इतना बिगड़ा हुआ है कि आगे क्या होगा इसका अंदाजा आज नहीं आ सकता। चाहे तो आप कल प्रस्थान करें, तब तक अंदाजा आ सकेगा ।” श्री गुरुजी ने कहा कि जो पूर्व नियोजित प्रवासक्रम है उसको स्थगित करना (Postpone) तो संभव नहीं है। ताईजी की उस अवस्था में श्री गुरुजी उनसे पूछने के लिये गये । पूछा, “ताई, मैं जाऊं?”। ताईजी ने कहा, “जा बेटा” । घर में जो अन्य लोग थे, आपस में बात करने लगे कि? “ताई मैं जाऊं?” यह लगातार पूछते रहने के लिये ही इस महापुरूष ने ताईजी के पेट में नौ मास तक वास किया होगा । और जा बेटा ऐसा हमेशा कहने के लिये ही क्या ताईजी ने इनको नौ मास अपने पेट में रखा था! श्री गुरूजी ने प्रवास के लिये प्रस्थान किया । ताईजी के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी डॉ. पांडे और अन्य डॉक्टरों ने सम्हाल ली । कठोर कर्मठता ताईजी की एक विशेषता थी और श्री भाऊजी की भी वही विशेषता थी। अपना कर्तव्य करते हुए कठोर कर्मठता और जो समय बचता था, सारा व्रत वैकल्य, पुरश्चरण, अनुष्ठान, आदि में व्यतीत होता था । श्री गुरूजी का ग्रहयोग ही मानो ऐसा दिखता है कि प्रारंभिक जीवन में कठोर कर्मठता रखने वालों के साथ ही उनका पाला पड़ा था । *पूजा पर्व – रात भर पूजा पात्र स्वच्छ करो* श्री अमिताभ महाराज के साथ श्री गुरुजी सारगाछी आश्रम में गये । अमिताभ महाराज ने स्वामी अखंडानंदजी महाराज से श्री गुरूजी का परिचय करा दिया । श्री गुरूजी जैसे उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति का स्वीकार करने से उनको हर्ष होना चाहिये था । स्वामी अखंडानंद जी, किन्तु अलग ढंग से सोचते थे । यह ऊंची शिक्षा प्राप्त होगा, परन्तु अपने लिये क्या स्वीकार करने योग्य है, इसकी यथोचित परीक्षा किये बगैर वे तैयार नहीं थे । एक अलग संदर्भ का वाक्य जो स्वामी अखंडानंदजी के लिये पूर्णत: लागू पड़ता है, मेरे स्मरण में है ।” “He was slow to appreciate, and slower still to express it” इतनी उंची शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को अमिताभ महाराज ने लाया, तो उसे रहने दो, ऐसा कहकर उन्होने श्री गुरूजी की कोई खास दखल नहीं ली, ऐसा लगा । एक-दो दिन के बाद श्री गुरूजी को एक काम करने के लिये कहा । दीपावली के पर्व पर रातभर जगन्माता की पूजा चलती थी । पूजा के बर्तन रात्री में अनेक बार पुकुर (छोटा जलाशय) के पानी से धोकर स्वच्छ करने का काम करने को श्री गुरुजी को कहा गया । स्वामीजी ने अमिताभ महाराज से कहा, “वह तुम्हारा गोलवलकर है, उसे कहना कि इतने सारे पूजा के बर्तन ठीक ढंग से स्वच्छ करने चाहिये ।” श्री गुरुजी पूरे एकाग्र चित्त से उस काम को रातभर करते रहे । स्वामी अखंडानंदजी ने श्री गुरुजी का काम, बर्तनों की स्वच्छता देखकर दूसरे दिन अमिताभ महाराज से कहा, “मैं उसे स्वीकार करने योग्य मानता हूं ।” श्री गुरूजी के श्रद्धेय गुरू महाराज भी ऐसे थे कि बिना कठोर परीक्षा के, उनका स्वीकार करने के लिये भी तैयार नहीं थे । श्री गुरूजी के प्रारंभिक जीवन काल में ऐसे ही लोगों से उनका पाला पड़ा था । कर्मकठोर जीवन की नींव मानों उनके प्राथमिक जीवनकाल में डाली गई थी । *पूजनीय डॉक्टरजी की सेवा शुश्रुषा* परमपूजनीय डॉक्टर जी के संपर्क में श्री गुरूजी, एक अधिकारी के नाते नहीं आये थे । वहां भी उनके संपर्क का आरंभ सेवा-शुश्रुषा कार्य से ही हुआ था । डॉक्टरजी बहुत बीमार थे । नासिक (महाराष्ट्र) में उनका औषधोपचार चल रहा था । डॉक्टर जी की सेवा-शुश्रुषा एक कठिन, कष्टप्रद काम था । उनको बहुत पसीना आता था । हर २० – २५ मिनिट के पश्वात बनियन गीली हो जाने से बदलनी पड़ती थी । दवा पानी, परहेज, यह सब कुछ श्री गुरूजी ही देखते थे । इस सेवा कार्य का अनुभव कर डॉक्टर जी ने उनकी क्षमता को समझ लिया था । स्वयं का कठोर जीवन और कर्मकठोर लोगों से पाला पड़ना, यही विशेषता श्री गुरूजी के जीवन मे हम देखते हैं । *अपने प्रति कठोर, दूसरों के प्रति बहुत सहृदय* श्री गुरूजी स्वयं अपने प्रति बहुत कठोर थे । आम तौर पर ऐसा दिखायी देता है कि स्वयं अपने प्रति कठोर रहने वाले दूसरों के प्रति भी कठोर रहते हैं । औरों को तकलीफ देते रहते हैं । श्री गुरूजी की विशेषता थी कि उनका स्वभाव ऐसा नहीं था । वे दूसरों के प्रति बहुत अधिक सहृदयता से व्यवहार करते थे । जब मैं उनके घर में रहने गया था तब मुझे यह अनुभव हुआ । यह मेरे लिये कोई श्रेय की बात नहीं थी, फिर भी कह देता हूं व्यवस्थित रहने का मेरा स्वभाव नहीं था । सुबह जगने के पश्चात् बिस्तर ठीक तह करके नियोजित स्थान पर रखने की आदत मुझे नहीं थी । श्री गुरूजी के मकान में पहली मंजिल पर बैठकर खाता था, पास ही श्री गुरूजी का कमरा था । लॉ कॉलेज में मुझे सुबह जाना रहता था इसलिये जल्दी जगकर, प्रातर्विधि, चाय पान आदि से निवृत होकर कॉलेज में चला जाता था । इस जल्दबाजी में अपना बिस्तरा लपेट कर नियोजित स्थान पर रखने का मुझे विस्मरण हो जाता था । कॉलेज में यह याद आती थी कि बिस्तर को लपेट कर रखना मैं भूल गया था । परंतु कॉलेज से लौटने के पश्चात् देखना था कि बिस्तर लपेट कर नियोजित स्थान पर रख दिया गया है । कमरे में मैं और नाना वैद्य, दो ही रहते थे । मैंने नाना को कहा कि, “माफ करना, मेरा बिस्तर आपको रखना पड़ता है । आपको कष्ट होता हैं, परन्तु मेरी आदत ही कुछ खराब है ।” नाना ने कहा, “आपका बिस्तर मैं कहां रखता हूं, जब मैं सुबह जगता तो तुम्हारा बिस्तर तो वहां दिखता ही नहीं ।” यह सुनकर मैं घबरा गया । मैंने सोचा कि दूसरे दिन कॉलेज में न जाते हुए और दूसरी सीढ़ी से टेरेस में जाना और मेरे बिस्तर को कौन लपेटता है, उसे देखता । दूसरे दिन वैसा करने पर मैंने देखा कि श्री गुरूजी ने ही मेरा बिस्तर लपेट कर नियोजित स्थान पर रख दिया था । इस बारे में उन्होंने कभी मुझे कहा नहीं, उलाहना देना तो दूर रहा। स्वयं अपने बारे में कठोर परन्तु दूसरों के बारे में उदारता, उनकी विशेषता थी ।
Comments
Post a Comment