सुभाषित
पिवन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः,
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः,परोपकाराय सतां विभूतयः ॥
भावार्थ - नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल अपने जल से उगा हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते । इसी प्रकार सत्पुरुष भी अपने सत्प्रयासों से प्राप्त लाभ/ उपलब्धि का भोग स्वयं नहीं करते।
वास्तव में सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है ।
मनसि एकं,वचसि एकम् ,
कर्मणि एकं सदात्मनाम्।
मनसि अन्यत्,वचसि अन्यत्,
कर्मणि अन्यत्,दुरात्मनाम् ।।
भावार्थ:- अद्भुत नेतृत्व की क्षमता के धनी व्यक्ति मन में जो भी विचार करते हैं,वही कहते हैं और स्वयं भी उसका अनुपालन करते हैं।
परन्तु स्वार्थी और निम्न स्वभाव वाले व्यक्ति मन में सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं।
सार:- प्रत्येक व्यक्ति को वही सोचना व कहना चाहिए, जिसका वह स्वयं अनुपालन करता हो।
भावार्थ - नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल अपने जल से उगा हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते । इसी प्रकार सत्पुरुष भी अपने सत्प्रयासों से प्राप्त लाभ/ उपलब्धि का भोग स्वयं नहीं करते।
वास्तव में सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है ।
मनसि एकं,वचसि एकम् ,
कर्मणि एकं सदात्मनाम्।
मनसि अन्यत्,वचसि अन्यत्,
कर्मणि अन्यत्,दुरात्मनाम् ।।
भावार्थ:- अद्भुत नेतृत्व की क्षमता के धनी व्यक्ति मन में जो भी विचार करते हैं,वही कहते हैं और स्वयं भी उसका अनुपालन करते हैं।
परन्तु स्वार्थी और निम्न स्वभाव वाले व्यक्ति मन में सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं।
सार:- प्रत्येक व्यक्ति को वही सोचना व कहना चाहिए, जिसका वह स्वयं अनुपालन करता हो।

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