स्वरोजगार - एक विकल्प
स्वरोजगार - एक विकल्प
-- देवेन्द्र कुमार शर्मा आचार्य
मदन मोहन कलावती सर्राफ सरस्वती विद्या मंदिर, मथुरा
बेरोजगारी के आलम में, स्वरोजगार अपनाना सीखें।
स्वयं स्वाबलंबी बन करके, औरों को भी जगाना सीखें।।
स्वयं तथा स्वजनों के पालन पोषण हेतु स्वयं के द्वारा संचालित एवं नियंत्रित जीविकोपार्जन का साधन ही स्वरोजगार कहलाता है।
सामान्यत: सरकार या किसी अन्य व्यक्ति के अधीन रहकर कोई जीविकोपार्जन का साधन रोजगार माना जाता है।
परन्तु अपने ही दिशानिर्देशों के अनुसार नियमित रूप से किया जाने वाला कार्य स्वरोजगार के अन्तर्गत आता है।
स्वरोजगार की आवश्यकता --
वर्तमान परिदृश्य में सरकार या अन्य औद्योगिक इकाइयों द्वारा सभी के लिए रोजगार सम्भव नहीं है क्योंकि हमें भलीभांति विदित है कि हमारा भारत देश जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरे स्थान पर है।इतनी अधिक जनसंख्या के दृष्टिगत, किसी भी सरकार के लिये सभी को रोजगार उपलब्ध कराना सम्भव नहीं है। इसलिए जीविकोपार्जन के लिए स्वरोजगार की अत्यधिक आवश्यकता है जो रोजगार का एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
आज का युवा वर्ग देश की बढ़ती हुई बेरोजगारी से पूर्णत: वाकिफ है। रोजगर प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। छात्रों में योग्यता व रोजगार के लिए बढ़ती हुई होड़ से परेशान व हताश हैं। उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं चूंकि स्वरोजगार के रूप में अभी भी एक विकल्प उन उत्साही, संघर्षशील व परिश्रमी युवाओं के लिए खुला है जिनकी या तो नौकरी में रुचि नहीं है या इस प्रतियोगी युग ने अपने लिए बढिय़ा-सा रोजगार हासिल करने में स्वयं को असमर्थ महसूस करते हैं। इसमें आपको नौकरी की तलाश में दर-दर भटकना भी नहीं पड़ेगा बल्कि आप अपने स्वयं मालिक होंगे।
समय की भी मांग है कि युवा वर्ग को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित किया जाए इसमें न केवल उनका अपितु देश का हित भी जुड़ा हुआ है। देश में स्वरोजगार का महत्व बढ़ा है । स्वरोजगार में खूबियां बहुत हैं जैसे-
1. आप अपनी रुचि, प्रतिभा व क्षमता के मुताबिक अपने क्षेत्र का चयन कर सकते हैं। जिसके लिए आपकी शैक्षिक व पेशेवर योग्यताएं आपके उज्ज्वल भविष्य की राह में मददगार साबित होंगी।
2. आप किसी भी स्तर व दर्जे का स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं। उच्चकांक्षा, समझ व प्रयास की बदौलत अंतहीन बुलंदियों को छुआ जा सकता है।
3. वर्तमान आर्थिक उदारीकरण औरभौतिकवादी संस्कृति ने मानव की जीवन शैली को एक नई दिशा प्रदान की है। लोगों का वस्तुओं के प्रति बढ़ता मोह व रुझान स्वरोजगार के लिए एक शुभ संकेत है।
4. स्वरोजगार शुरू करने पर आप न केवल स्वयं को बल्कि अन्य बेरोजगार युवाओं को भी रोजगार का अवसर मुहैया करवाएंगे। इस कार्य से आप समाज के प्रति अपने दायित्वों का भी निर्वाह कर सकते हैं।
स्वरोजगार के क्षेत्र --
जब आप स्वरोजगार की योजना बनाएं तो आप इसके लिए निम्नलिखित अवसरों को ध्यान में रख सकते हैं :
*छोटे पैमाने का फुटकर व्यापार : एक अकेला स्वामी छोटे व्यावसायिक इकाइयों को एक या दो सहायकों के सहयोग से सरलता से प्रारम्भ कर सकता है तथा लाभ कमा सकता है।
*व्यक्तिगत निपुणता के आधर पर सेवाएं प्रदान करना : जो लोग अपनी विशिष्ट निपुणता के आधर पर ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करते हैं वह भी स्वरोजगार में सम्मिलित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए साईकिल, स्कूटर, घड़ियों की मरम्मत, सिलाई, बाल संवारना आदि ऐसी सेवाएं हैं जो ग्राहक को व्यक्तिगत रूप से प्रदान की जाती हैं।
*पेशेगत योग्यताओं पर आधरित व्यवसाय : जिन कार्यों के लिए पेशे सम्बन्धी प्रशिक्षण एवं अनुभव की आवश्यकता होती है वह भी स्वरोजगार के अंतर्गत आते हैं। उदाहरण के लिए पेशे में कार्यरत डॉक्टर, वकील, चाटर्ड एकाउन्टैंट, फार्मेसिस्ट, आरकीटैक्ट आदि भी अपने विशिष्ट प्रशिक्षण एवं निपुणता के आधर पर स्वरोजगार की श्रेणी में आते हैं। इनके छोटे प्रतिष्ठान होते हैं जैसे क्लीनिक, दफ्तर का स्थान, चैम्बर आदि तथा यह एक या दो सहायकों की सहायता से अपने ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करते हैं।
*छोटे पैमाने की कृषि : कृषि के छोटे पैमाने के कार्य जैसे डेरी, मुर्गीपालन, बागबानी, रेशम उत्पादन आदि में स्वरोजगार सम्भव है।
*ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग :चर्खा कातना, बुनना, हाथ से बुनना, कपड़ों की सिलाई भी स्वरोजगार है। यह पारम्परिक विरासत में मिली निपुणताएं हैं।
*कला एवं काश्तकारी/शिल्प : जो लोग किसी कला अथवा शिल्प में प्रशिक्षण प्राप्त हैं वह भी स्व रोजगार ही है। इनके व्यवसाय हैं - सुनार, लोहार, बढ़ई आदि।
स्वरोजगार के लिए आवश्यक गुण --
*बौद्धिक योग्यताएं : आप यदि स्वरोजगार में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो आप में स्वरोजगार के सर्वाधिक अनुकूल अवसरों की पहचान करने की योग्यता होनी आवश्यक है। साथ ही व्यवसाय परिचालन के सम्बन्ध में निर्णय लेने तथा तरह-तरह के ग्राहकों को संतुष्ट करने की योग्यता का होना भी महत्व रखता है।
*सतर्कता तथा दूर-दृष्टि : स्वरोजगार में लगे व्यक्ति को बाजार में हो रहे परिवर्तनों के प्रति सचेत और सतर्क होना चाहिए जिससे कि वह उनके अनुसार अपने व्यवसाय के कार्यों का समायोजन कर सके। उसमें दूर-दृष्टि का भी होना आवश्यक है जिससे कि वह संभावित परिवर्तनों का अनुमान लगा सके, अवसरों का लाभ उठा सके तथा भविष्य में यदि किसी प्रकार के खतरे की संभावना है तो उनका सामना कर सके।
*आत्मविश्वास : स्वरोजगार में मालिक को ही सभी निर्णय लेने आवश्यक होते हैं क्योंकि उसे समस्याओं को हल करना होता है तथा आपूर्तिकर्ता, लेनदार ग्राहक तथा सरकारी अधिकारियों का समाना करना होता है।
*व्यवसाय का ज्ञान : जो भी व्यक्ति स्वरोजगार में लगा है उसको व्यवसाय का पूरा ज्ञान होना चाहिए। इसमें व्यवसाय को चलाने का तकनीकी ज्ञान एवं कौशल भी सम्मिलित है।
*सम्बन्धित कानूनों का ज्ञान : जो स्वरोजगार में लगा है, यह आवश्यक नहीं कि वह कानून का विशेषज्ञ हो लेकिन उसे जहां उसका व्यवसाय चल रहा है वहां के व्यवसाय सम्बन्धी एवं सेवाओं से सम्बन्धित कानूनों का काम चलाऊ ज्ञान होना आवश्यक है। इनमें ट्रेड एंड ऐस्टेबलिशमेंट एक्ट, विक्रय कर एवं उत्पादन कर से संबंधित कानून एवं प्रदूषण नियंत्रण आदि से संबंधित नियम हैं।
*लेखा कार्य का ज्ञान : व्यवसाय करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सभी लेन देनों का पूरा ब्यौरा रखना होता है जिससे कि वह आवधिक अन्तराल का लाभ हानि निर्धरित कर सके, भुगतान तिथि को अपने लेनदारों का भुगतान कर सके, ग्राहकों से पैसा वसूल कर सके तथा करों का भुगतान कर सके। इस सबके लिए उसे लेखा कार्य का आवश्यक ज्ञान होना जरूरी है।
*अन्य व्यक्तिगत गुण : स्वरोजगार में लगे व्यक्ति में ईमानदारी, गंभीर तथा परिश्रमी जैसे गुणों का होना आवश्यक है।
सवेतन की वरीयता में स्वरोजगार --
स्वरोजगार, अक्सर सवेतन से निम्न कारणों से बेहतर माना जाता है :
*स्वरोजगार से आप अपने समय व योग्यता का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं।
*स्वरोजगार पूँजी के अत्याधिक संसाधनों तथा अन्य संसाधनों के बिना भी संभव है। उदाहरण के लिए एक मरम्मत की दुकान कम पूँजी से शुरू की जा सकती है।
*स्वरोजगार में एक व्यक्ति ‘कार्य पर’ रह कर कई चीजें सीखता है क्योंकि उसे अपने व्यवसाय से सम्बन्धित अपने फायदे के लिए सभी निर्णय स्वयं लेने होते हैं।
स्वरोजगार तथा सवेतन रोजगार में अंतर --
*नौकरी या सवेतन रोजगार में व्यक्ति कर्मचारी होता है, जबकि स्वरोजगार में वह स्वयं नियोक्ता की तरह होता है।
*नौकरी में आमदनी नियोक्ता पर निर्भर करती है कि वह कितना वेतन देता है, जबकि स्वरोजगार में उस व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है जो स्वरोजगार में लगा हुआ है।
*नौकरी में व्यक्ति दूसरों के लाभ के लिए कार्य करता है जबकि स्वरोजगार में व्यक्ति अपने ही लाभ के लिए कार्य करता है।
*नौकरी में आय सीमित होती है, जो पहले से ही नियोक्ता द्वारा तय कर ली जाती है। जबकि स्वरोजगार में स्वरोजगार में लगे हुए व्यक्ति की लगन व योग्यता पर निर्भर करती है।
*नौकरी में कर्मचारी को ‘कार्य विशेष’ नियोक्ता द्वारा दिया जाता है, जबकि स्वरोजगार में वह अपनी आवश्यकतानुसार कार्य चुनता है।
निष्कर्ष --
अन्त में हम यह कह सकते हैं कि हममें से प्रत्येक को किसी न किसी स्तर पर अपना जीवनयापन करने के लिये जीविकोपार्जन का साधन चुनना पड़ता है। व्यापार का क्षेत्र स्वरोजगार तथा सवेतन रोजगार के अनगिनत अवसर प्रदान करता है। आज स्वरोजगार, बेरोजगारी दूर करने का एक अति उत्तम विकल्प है जिससे स्वयं की उन्नति के साथ - साथ देश की उन्नति भी होती है। स्वयं के लिये कार्य करना अपने आप में एक चुनौती तथा प्रसन्नता है।
"स्वरोजगार मन से अपनायें
बेरोजगारी दूर भगायें ।
हम स्वयं, परिवार, समाज को
समृद्ध और खुशहाल बनायें।।"

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