जानकारी काल अप्रैल - 2023

 जानकारी काल 

   वर्ष-23, अंक-11, अप्रैल -2023, पृष्ठ 56  मूल्य 2-50    

 

बैसाखी का अर्थ वैशाख माह का त्यौहार है। यह वैशाख सौर मास का प्रथम दिन होता है। बैसाखी वैशाखी का ही अपभ्रंश है। इस दिन गंगा नदी में स्नान का बहुत महत्व है। हरिद्वार और ऋषिकेश में बैसाखी पर्व पर भारी मेला लगता है। बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है । इस कारण इस दिन को मेष संक्रान्ति भी कहते है।


संरक्षक

 श्रीमान कुलवीर शर्मा

कमहामंत्री समर्थ शिक्षा समिति

डॉ वी  एस नेगी

प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य


 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 


 

 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी

 नई दिल्ली 110012


 मोबाइल

  9312002527


 संपादक मंडल

 सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा,

गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध,राजेश शुक्ल  


प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,

कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |


सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी

 

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        अनुक्रमणिका

सम्पादकीय   - 3   

जीवन का घनिष्ठतम अनुभव - 4 लेख

हमारा वैभव शाली इतिहास  - 8 कहानी

हिन्दु मध्य वर्ग की सर्वानुमति - 10 लेख

पाश्चात्य सभ्यता के योगदान - 13 लेख

दो पत्तो की कहानी - 15 - कहानी

जीवन की तुला - 17 कविता 

सच है की हर रंग कुछ कहता है - 18 कविता 

अग्निपथ से कर्तव्यपथ - 19 कविता 

कला भेद से भगवान के अवतार  - 20 लेख

सिद्धियाँ का विवरण - 24 लेख

यज्ञ मे मंत्रों का ऊंच स्वर में उच्चारण क्यो? - 26 लेख 

वास्तविकता  - 28 कविता

अप्रैल मास के महत्वपूर्ण दिवस व महापुरुष के जन्म दिन - 29  

मंदिर मे ध्वजा और उसका महत्व - 33  लेख

डर - 36 कविता

ईश्वर का प्रमाण- 37  लेख 

बुद्ध ने अपने बेटे राहुल को भिक्षा पात्र दिया - 38 लेख 

मासिक पंचांग,पंचक विचार,भद्रा विचार,अप्रैल मास के व्रत,

सर्वार्थ सिद्ध योग,मूल विचार - 41 ज्योतिष

बरुधिनी एकादशी - 46 कथा 

कामदा एकादशी - 48 कथा 

भारत मे सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार - 50 लेख 

मंदबुद्धि - 53 कहानी 

अच्छी परवरिश - 54  लेख 

पवनमुक्तासन - 56 योग 






सम्पादकीय 

विश्वास का उद्देश्य अपने आप में विश्वास करना है और भगवान को अपने जीवन में आने और नियंत्रण करने की अनुमति देना है।

आस्था का संबंध केवल आत्मा-परमात्मा से नहीं, संपूर्ण अस्तित्व से है। आस्था जीवन की संचालन शक्ति है। संशय उत्पन्न होते ही वह शक्ति गड़बड़ा जाती है। अगर जीवन-व्यवस्था को ढंग से चलाना है तो हमें विश्वास और आस्था का सहारा लेना ही  है--"आस्था किसी विचार, मूल्य, व्यक्ति अथवा कथन में वह दृढ़ विश्वास है जिसे वह पर्याप्त एवं विश्वसनीय प्रमाणों के न होते हुए भी पूर्णतः स्वीकार करता है जिसमें कुछ अनिश्चयात्मकता अनिवार्यतः विद्यमान रहती है।"श्रद्धा पवित्र आचरण से निर्माण होती है यदि किसी व्यक्ति में सत्य निष्ठा पवित्रता एवं निस्वार्थ बुद्धि हो तो अनेक लोग उसके निकट आते हैं उसके शब्दों का मान होता है वह हृदय हृदय का स्वामी बनता है श्रद्धा की एक लहर निर्माण होती है और यही आस्था में बदल जाती है | आस्था और बुद्धि परस्पर विरोधी है इनका आपस में कोई संबंध नहीं है ऐसा सोचना गलत है अगर ऐसा होता तो भगवान वेदव्यास जगतगुरु शंकराचार्य संत ज्ञानेश्वर स्वामी विवेकानंद जैसे बुद्धिमान लोग आस्थावान नहीं कहलाते | लोग कहते हैं तर्क से आस्था कमजोर होती है मैं कहता हूं तर्क से आस्था बढ़ती है और धीरे-धीरे जीवन में ज्ञान की लहर उत्पन्न होने लगती है और अगर एक बार आस्था बढ़ने लगी तो सम्पूर्ण समाज में फैलती है | समान  आस्था युक्त व्यक्ति  समूह को ही समाज अथवा राष्ट्र का अभिधान प्राप्त होता है | राष्ट्र के अंग अंग में समान आस्था प्रस्थापित होने से अनुशासनपूर्ण विराट शक्ति का आभिभार्व होकर राष्ट्र को सुख समृद्धि और ऐश्वर्य प्राप्त होता है | गीता में भगवान कृष्ण अनेकों बार कहा है तुम अज्ञानी हो या ज्ञानी हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर तुम आस्थावान हो तो तुम मेरे पास जल्दी आ जाओगे आस्था से विश्वास उत्पन्न होता है और विश्वास से समाज का निर्माण होता है | समाज में आस्था का बीजारोपण करना पडता है और श्रद्धा और विश्वास की जड़े जमानी पड़ेगी साथ ही शुद्ध आस्था चाहिए, ईश्वर पर आस्था चाहिए, संपूर्ण जगत का निर्माण ईश्वर ने किया है यह सब मानव उसी के द्वारा निर्मित हैं ऐसी आस्था चाहिए, मैं ईश्वर का पुत्र हूं और प्राणी मात्र मेरे बांधव है सबके जीवन का कोई ना कोई हेतु है ऐसा  मेरा विश्वास है |

आस्था से आत्मविश्वास बनता है |  जिनमे आत्मविश्वास  की मात्रा अधिक होती है वही कुछ बड़ा काम कर सकते हैं या अपने उद्देश्य में अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं | ऐसा व्यक्ति सन्यासी होकर जब दूसरे व्यक्तियों के संपर्क में आता है तो उन लोगों के अंदर भी दृढ़ निश्चय भाव पैदा करता है और उस दृढ़ निश्चय से  उस व्यक्ति के जो काम है पूरे होते हैं रोग दूर होते है  उसका निश्चय  मजबूत होता है उसका मन मजबूत होता है  उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और उस पर  विश्वास करने से वह व्यक्ति समझता है कि सामने वाले व्यक्ति ने मेरे साथ चमत्कार कर दिया है |





 

 जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)

 नम्रता दत्त

शिशु शिक्षा पर विशेष महत्व एवं चिन्तन का कारण है उसका समग्र विकास जो कि इस अवस्था में 85 प्रतिशत हो जाता है। इस समग्र विकास/व्यक्तित्व विकास कोदो भागों में बांटकर समझा जा सकता है – व्यक्तित्व/ व्यष्टिगत/ पंचकोशात्मक विकास (अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश)।

समष्टिगत (परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व), सृष्टिगत (पर्यावरण) और परमेष्ठिगत (परमात्मा, इस सम्पूर्ण सत्ता को बनाने वाला)।

गत सोपानों में अनौपचारिक शिक्षा क्या और क्यों पर विचार किया था। इस सोपान में अनौपचारिक शिक्षा ‘कैसे’ पर विस्तार से विचार करेंगे। उपरोक्त समग्र विकास हेतु बालक के मसितष्क का 85 प्रतिशत विकास पठन और लेखन/ भाषण के द्वारा सम्भव नहीं बल्कि इसका आधार अनौपचारिक शिक्षा द्वारा संस्कारों का निर्माण करना है। उल्लेखनीय है कि अनौपचारिक शिक्षा को हम शिशु की प्रारंभिक अवस्था में देखभाल मान सकते हैं जो कि बाल्यावस्था में जाकर औपचारिक शिक्षा का आधार बनेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी इसको (ECCE) सीखने की नींव कहा गया है। तो आइए जीवन की नींव से ही प्रारम्भ करते हैं –

जीवन का घनिष्ठतम अनुभव

इस जीवन की प्रारम्भिक अवस्था क्या है, जिसका ज्ञान एवं ध्यान हमें सीखने/शिक्षा में सहयोगी हो 





सकता है। शिक्षा पेट भरने का साधन नहीं अपितु जीवन जीने की कला है। इसलिए कहा जाता है – सा विद्या या विमुक्तये।

पंचमहाभूत तत्वों का परिचय

यह तन जिसमें आत्मा निवास करती है, पंचमहाभूत तत्वों से बना है। जैसे मिट्टी से बना घङा मिट्टी में ही मिल जाता है, वैसे ही पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से बना यह तन पांच तत्वों में ही मिल जाता है। परन्तु इस तन के माध्यम से किए गए कर्मों के संस्कार, इसमें स्थित आत्मा (जो कि अजर, अमर और अविनाशी है) अपने साथ ले जाती है। अगले जन्म में यही संस्कार उसके पूर्व जन्म के संस्कार कहलाते हैं। सृष्टि के पांचों तत्व हमारे तन/शरीर में विद्यमान होते हैं।

जैसे मिट्टी, रेत, कंकङ-पत्थर और धातु आदि पृथ्वी तत्व से बने हैं वैसे ही शरीर की मांसपेशियां, हड्डियां आदि भी पृथ्वी तत्व से बने हैं। शरीर में बहने वाला खून, पसीना और मल-मूत्र आदि जल का रूप हैं, आंखों के तेज और जठराग्नि में अग्नि तत्व होता है, श्वास-प्रश्वास, रक्त का प्रवाह, हृदय की धङकन, मल-मूत्र का त्याग सब वायु के ही कारण सम्भव है और शरीर में जो भी स्थान खाली है, वहां आकाश तत्व विद्यमान होता है जैसे – गला (वाणी तंत्र), श्वास नलिका और कान आदि।

इन पांच तत्वों से न केवल यह शरीर बनता है, इन पांच तत्वों से ही पांच ज्ञानेन्द्रिय भी बनती हैं और इन्हीं के माध्यम से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसलिए इन पंचमहाभूतों का परिचय एवं इनके गुणधर्मों के बारे में बताना ही जीवन का घनिष्ठतम अनुभव देना है।

अभिभावक और आचार्य को इसके महत्व की गहनता को समझना चाहिए क्योंकि शिक्षा/सीखने के लिए यह शरीर और ज्ञानेन्द्रियां ही मुख्य साधन (Main Tools) हैं और ये दोनों पंचमहाभूत से ही बने हैं। शिशु अवस्था में चित्त की सक्रियता के कारण इनके माध्यम से लिए गए अनुभव सीधे ही आत्मा के संस्कार बन जाते हैं। शिशु जैसा देखेगा (ज्ञानेन्द्रिय आंख द्वारा), जैसा सुनेगा (ज्ञानेन्द्रिय कान द्वारा) वैसा ही अनुकरण करेगा। ऐसा ही अन्य ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों के द्वारा ही संस्कार बनते हैं।

पदार्थो के गुणधर्म का परिचय

माता के गर्भ में 9 मास तक रहने के कारण शिशु को माता से ही सर्वाधिक प्रेम, स्नेह और सुरक्षा का अनुभव होता है, उसी तरह इन पंचमहाभूतों से बना होने के कारण वह इनके बीच में रहने से ही आनन्द की अनुभूति करता है। मिट्टी-पानी में खेलना, खुली हवा में घूमना, आकाश में सूरज-चांद-तारों और उङते पक्षियों को देखना उसे भाता है। ये सब प्राकृतिक रूप से उसके स्वभाव में शामिल होता है और इन्हीं सबसे तो उपरोक्त समग्र विकास की पूर्ति होनी है। अज्ञानता वश हम इन सबके सान्निध्य से उसे रोकने का प्रयास करते हैं, जबकि हमें तो खेल खेल में उसके इस आनन्द से उसे उचित सीखने का वातावरण देना चाहिए।

उदाहरण के लिए पंचमहाभूतों के कुछ गुणधर्म –

सूखी मिट्टी कठोर होती है, पर गीली मिट्टी कोमल होती है।






मिट्टी पानी को सोख लेती है, पर पत्थर नहीं सोखता।

दो पत्थरों को रगङने से चिंगारी निकलती है।

पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है।

तेल डालने से आग जलती है, पर पानी डालने से आग बुझ जाती है।

गोल चीज लुङकती है, पर चपटी नहीं।

पानी को जिस बर्तन में डालो, वैसा ही रूप ले लेता है।

पानी में कुछ चीजें डूब जाती हैं और कुछ चीजें तैरती रहती हैं।

आग हवा के कारण ही जलती है और हवा के कारण ही बुझ भी जाती है, क्यों और कैसे ?

खुले और खाली बन्द कमरे मे आवाज गूंजती है।

यह सब भौतिक विज्ञान, इस भौतिक जगत से ही जुङा हुआ है। ऐसे ही अनेक गुणधर्मों का अनुभव केवल गतिविधियों के द्वारा अनौपचारिक रूप से इसी आयु में देना ही अनिवार्य है क्योंकि यही आयु सीखने की नींव कहलाती है। इस आयु में पढ़ना और लिखना तो उसको आता ही नहीं और मात्र भाषण से अनुभव लेना सम्भव नहीं। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी क्रिया आधारित एवं खोज आधारित शिक्षा की शिक्षण विधियों (Padagogy) को सीखाने का माध्यम बताया है।

यह अनुभव केवल प्री-स्कूल/शिशुवाटिका में ही नहीं बल्कि घर में भी दिये जा सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को भी इसका ज्ञान होना जरूरी है। शिशुवाटिका में भी इन अनुभवों को कराने के लिए सामग्री से सुसज्जित प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है। शिशुवाटिका की आचार्य दीदी को भी समय समय पर अभिभावकों को गतिविधियों एवं उससे होने वाले विकास के बारे में बताना चाहिए।

ललित कलाओं का रसास्वादन

कला के बिना मनुष्य पशु के समान माना जाता है। शिशु अवस्था में शिशुओं की चित्रकारी के शौक को कौन नहीं जानता। घर की दीवारें हों या भाई-बहन की पुस्तक-कापियां, शिशुओं की चित्रकारी से अछूती नहीं रहती।

किसी संस्कार पत्रिका के लेखन के लिए मेरा किन्हीं सज्जन के घर जाना हुआ। उनका लगभग 3 वर्ष का पोता मोहित उनके पास था क्योंकि उनकी बहू विद्यालय में पढ़ाने गई हुई थीं। मोहित को व्यस्त करने के लिए उन्होंने एक कागज और पेंसिल दे दी। मोहित ने कागज पर कुछ गोल गोल और आङी-तिरछी रेखायें बनाकर अपने माता-पिता, बङे भाई तथा दादा जी के चित्र बनाए। अब वह बोर होने लगा तो उन्होंने यूटयूब पर बच्चों की कविताएं चला दीं। मोहित मस्त होकर नाच-नाच कर कविता गाने लगा। हमारा कार्य भी लगभग खत्म हो गया, तो दादा जी ने उसे कहानी सुनाने के लिए कहा। मोहित ने पूरे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई। अभी मोहित की माँ भी विद्यालय से वापिस आ गई थीं। 

उन्होंने आते ही हमारे लिए भोजन पकाना शुरू किया। परन्तु मोहित अपनी माँ के साथ खेलना चाहता था। माँ ने उसे थोङा सा आटा दिया और कहा कि कल जैसे चिङिया बनानी सिखाई थी, वैसी बनाओ। 






मोहित तो प्रसन्न…। उसने आटे से चिङिया और सांप आदि बनाए।

मोहित की माँ शिशुवाटिका की आचार्य थीं। शिशु के मनोविज्ञान और उसके विकास को भली प्रकार जानती थीं। उन्होंने दादा जी को भी यह सब बता रखा था। यही सब तो ललित कलाएं हैं। चित्र बनाना, गीत गाना, कहानी सुनाना, बातें करना, नाटक करना, खिलौने बनाना आदि। खेल खेल में मोहित आनन्द से ये सभी कलायें सरलता और सहजता से सीख रहा था। मोहित की माँ जैसी जागरूकता प्रत्येक अभिभावक में होनी चाहिए।

ऐसी गतिविधियों से शिशु में सृजनशीलता का संस्कार आता है। ऐसा सृजनशील बालक कभी विसर्जन (तोङ-फोङ /हानि) नहीं कर सकता। यही तो है जीवन का घनिष्ठतम अनुभव।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।



   हमारा वैभव शाली इतिहास 

300 वर्ष तक भारत के बड़े भूभाग पर राज करने वाले होलकर की जाति से आने वाले धनगर और सिंधिया के कुनबे वाले आज पिछड़े हैं। वहीं उन महाराजा विक्रमादित्य हेमराज तेली के वंशज आज पिछड़े हैं जिन्होंने अखंड भारत पर राज किया..!वह मौर्य साम्राज्य आज पिछड़ा/दलित है, जिनके वंशजों ने पीढ़ियों तक बंगाल की खाड़ी से लेकर पर्शिया की सीमा तक अखंड भारतवर्ष पर राज किया। महापद्मनंद और धनानंद का वंशज नाई समुदाय आज पिछड़ा है। जो भारत के सबसे शक्तिशाली राजे होते थे ! हिंदुओं के सबसे पवित्र ग्रंथ रामायण के रचियता और श्री राम की अर्धांगिनी माता सीता को अपने आश्रम में शरण देने वाले, श्री राम के पुत्रों लव कुश का पालन पोषण और उनको शिक्षित करने वाले महर्षि वाल्मीकि के वंशज आज अछूत कैसे हो गए या हो सकते हैं!

महर्षि वेद व्यास की माता व मछुआरा समुदाय से आने वाली रानी सत्यवती के वंशज भी आज पिछड़े हैं। जिनके बच्चे हस्तिनापुर पर राज करने वाले कौरव और पांडव अखंड भारत के सबसे महान योद्धा और चक्रवर्ती सम्राट थे। उस आदिवासी कन्या शकुंतला का समुदाय भी आज अनुसूचित जनजाति में काउंट होता है जिनके पुत्र "भरत" के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

महर्षि वेद व्यास, महर्षि वाल्मीकि, आचार्य विदुर, सम्राट चंद्रगुप्त, सम्राट अशोक जैसे और भी अनेका अनेक उदाहरण हैं.... जिनके वंशज/स्वजातीय लोग आज स्वयं को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग का बताकर अपने साथ शोषण, दमन और अत्याचार हुआ बताते हैं।

अब सवाल ये उठता है कि...





क्या इतने लंबे समय तक राज करने वाले इन वर्गों के राजाओं ने अपनी ही जात, बिरादरी वालों पर स्वयं ही अत्याचार किया/होने दिया या उन को पढ़ने/बढ़ने नही दिया !! उन्हें हजारो वर्षों से अनपढ़, गंवार व शोषित बनाये रखा !! भगवान कृष्ण के वंशज होने का दावा करने वाले, आज भी बड़ी बड़ी जमीन जायदाद वाले, हर तरह से संपन्न यदुवंशी अंततः पिछड़े कैसे हो गए !! मध्य काल में बहराइच से नेपाल तक बड़े भूभाग पर राज करने वाले पासी आखिर दलित कैसे हो गए !! मध्यकाल में प्रसिद्ध पाल वंशी राजाओं के वंशज कैसे पिछड़े हो गए !! इतिहास में चंवर वंशी राजाओं का जिक्र है जो आज दलित कहे जाते हैं। गौर, गुर्जर, मीणा, जाट, वर्मा, गोंड आदि वर्ग के राजा सब बड़े लम्बे समय तक शासक रहे हैं। देश के इतिहास में इनकी छाप है। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि मुगल आक्रांताओं के शासन काल व उसके बाद अंग्रेजी शासन काल की गुलामी के बाद ये सारे वर्ग विभाजित होकर वंचित, शोषित और पीड़ित कहलाने लगे.... क्या किसी ने यह विचार किया कि कहीं विदेशी आक्रांताओं ने ही हिंदू सनातन समाज में फूट डालने के लिए ये अंकुरण तो नहीं किया?

परतंत्रता से निकलने के बाद भी विभाजन की दोधारी तलवार से समस्त हिंदु समाज को काटने की रणनीति के चलते ही 1947 के बाद इस विभाजन को और गहरा ही किया गया !!

अन्यथा यह कैसे संभव है कि तुम लंबे समय तक राज भी करो और विदेशी नेक्सस के फैलाए जाल में फंसकर विक्टिज़्म भी बन जाओ... और राजा बनने के बाद भी क्या आपके स्वजातीय राजा अपनी जात/बिरादरी के साथ ऐसा ही करते रहे कि वो अनपढ़/गंवार/मूर्ख/पिछड़ा/दबा/कुचला ही बना रहे !!

सैकड़ों वर्षो तक अखंड भारत पर राज करने के बाद भी तुम अपनी जाति का उद्धार नहीं कर सके तो इसमें दोष ब्राह्मण और हिन्दू धर्मशास्त्र को क्यों देते हो !! 

एक बार स्वयं की ओर झांक कर भी देखो..!







हिन्दू मध्यवर्ग की सर्वानुमति 

समकालीन भारत में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ शासक कौन है?


-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

 वाल्मीकि रामायण के प्रारंभ में ही तपस्वी वाल्मीकि तप और स्वाध्याय में निरत वाग्विद नारद जी से पूछते हैं कि ‘हे देव, इस समय लोक में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़प्रतिज्ञ, चरित्रसम्पन्न, समस्त प्राणियांे का हितकारी और समर्थ कौन है?’ पाँच श्लोकों में उन प्रश्नांे का उल्लेख है जिनका सार उपर्युक्त है। इस पर नारदजी उत्तर देते हैं और वे भगवान श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हैं। 

 यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि सबसे बड़ा राजनैतिक प्रश्न सदा यही होता है कि समकालीन राष्ट्र या लोक या देश में धर्मज्ञ, वीर्यवान, सत्यवक्ता, गुणवान, चरित्रसम्पन्न और दृढ़प्रतिज्ञ शासक कौन है। यह प्रश्न भारत के राजनीति में रूचि रखने वाले लोगों द्वारा विगत 75 वर्षों में कभी उठाया ही नहीं गया है। इससे स्पष्ट है कि जिसे अंग्रेजी में ‘पॉलिटी’ कहते हैं, वह ‘हिन्दू पॉलिटी’ इस विषय में उदासीन है। जो भी लोग दल बना लेते हैं, उनमें से ही किसी न किसी के पक्ष या विपक्ष में लोग बातें करने लगते हैं। सर्वविदित है कि ये सभी दल एंग्लों ख्रीस्त राज्य की संरचना वाले वर्तमान राजकीय ढांचे में प्रभावशाली और महत्वपूर्ण स्थान पाने के लिये ही बने हैं। इसीलिये मैंने बार-बार यह कहा है कि एंग्लो ख्रीस्त राज्य की संरचना में हिन्दू समाज के प्रभावशाली समुदायों की सर्वानुमति है। सभी लोग इसी ढांचे में कुछ नीतिगत निर्णयों के लिये बहस करते रहते हैं। 

 ऐसी स्थिति में हिन्दू धर्म या सनातन धर्म की बात का वस्तुतः व्यवहार में केवल इतना ही अर्थ रह जाता 





है कि आप उन श्रेष्ठ संस्कारों को और उनकी स्मृति को जीवित रखना चाहते हैं। परन्तु यह भी स्पष्ट है कि उसके अनुरूप राज्य की रचना हो और समाज चले, इसमंे आपकी कोई रूचि नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा शासन या कांग्रेस शासन के कार्यों के पक्ष में अथवा विरोध में तात्कालिक रूप से मत व्यक्त करना या टिप्पणी करना तो स्वाभाविक है परन्तु उसे व्यापक सनातन धर्म के प्रवाह से जोड़कर देखना या बताना अज्ञान है। क्योंकि उस प्रवाह की तो कोई बात ही राजनीति में वर्तमान में कहीं है नहीं।  यह तथ्य सदा ध्यान रखना चाहिये। अतः आपका समस्त विरोध छिटपुट मुद्दों पर तात्कालिक प्रतिक्रिया से अधिक महत्व नहीं रखता। 

 सत्य यह है कि यह जो एंग्लो ख्रीस्त संरचना वाला आधुनिक राज्य है इसमें राजतंत्र के पास और राज्यकर्ताओं के पास उससे कहीं बहुत अधिक शक्ति है, जितनी शक्ति भारत के चक्रवर्ती सम्राटों के पास होती थी। भारत के सम्राट सदा धर्मशास्त्रों की मर्यादा में काम करते थे। आधुनिक राज्यकर्ताओं ने धर्मशास्त्रों को विधिक शक्ति से रहित कर दिया है। एंग्लो सेक्शन लॉ के जानकार विधिक अधिकारी या ज्युडिशियल अधिकारी ही विधिक शक्ति से सम्पन्न हैं। ऐसी स्थिति में वे राष्ट्र और समाज के विषय में कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं। ध्यान केवल इस बात का रखना पड़ता है कि लोग इतने नाराज न हो जायें कि हमें वोट न दें या हमारे विरोध में वोट दें। केवल इसी का एक डर रहता है। शेष तो धर्म या ईश्वर से वस्तुतः कोई भी राजनेता या अफसर डरते नहीं हैं। इस विषय में जानना चाहिये कि अल्लाह से या जोशुआ के पिता गॉड से डरना ईश्वर से डरना नहीं है। क्योंकि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और प्रत्येक प्राणी की अन्तश्चेतना में यानी आत्मा में वे प्रकाशित हैं। अतः राज्य को उन सबका वास्तविक प्रतिनिधि मानना और उन्हें विचार सम्पन्न तथा भावसम्पन्न सत्ता मानना ही ईश्वर को मानना है। उस अर्थ में जो हमारा मूल संविधान है, वह संविधान लिखने वाले लोगों के मन में भारतीय संस्कारों की छाप रहने के कारण ईश्वर के सर्वव्यापी रूप को इस अर्थ में पूरी तरह मानता है कि वह चुने गये राजपुरूषों को जनप्रतिनिधि ही मानता है और उनसे जनप्रतिनिधि ही होने की अपेक्षा करता है। परंतु उसके तत्काल बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस के सोशलिस्ट धड़े ने जनता के उद्धार का बीड़ा उठा लिया। अर्थात जनता को अंधकार में पड़ी हुई मान लिया और स्वयं को उसका मुक्तिदाता मान लिया। जो स्पष्ट रूप से ईसाई धारणा है। अतः राजनैतिक दल का व्यवहार ईश्वर विरोधी हो गया। वह जोशुआ के पिता के अनुयायी जैसा या अल्लाह के आखिरी पैगम्बर के बंदे जैसा हो गया। जिसमें लोगों का उद्धार करना मुख्य काम है। यह उद्धार किसी कष्ट से उद्धार नहीं है अपितु एक काल्पनिक जहालत या अंधकार या अज्ञान से उद्धार है। इस प्रकार यह वस्तुतः उद्धार का एक ‘ऑइडिया’ है, तथ्य नहीं। ऐसे लोग जो अपनी सत्ता और प्रभुता के विस्तार के लिये कार्य करते हैं, उसे ही शेष सबका उद्धार बता देते हैं। 

 स्पष्ट है कि सनातन धर्म के संस्कारों से सम्पन्न कोई भी व्यक्ति दलों के नेताओं को मसीहा या पैगम्बर नहीं मान सकता। अब तक के सभी दलों के नेताओं के आचरण के कारण कोई भी संस्कारी व्यक्ति 





उन्हें अवतारी पुरूष होना तो दूर (जो कि उनमें से कोई कभी हुआ ही नहीं है), धर्मनिष्ठ भी नहीं कह सकता। क्योंकि उनमें से किसी ने स्वयं को कभी भी धर्मनिष्ठ नहीं कहा है अपितु सदा स्वयं को धर्मनिरपेक्ष ही बताया है। मैं सच्चा धर्मनिरपेक्ष, मेरा विरोधी झूठा धर्मनिरपेक्ष, बस यही तू-तू मैं-मैं भारतीय राजनीति में चलती रही है और केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे ही राजनैतिक मुद्दे बनाये जाते रहे हैं तथा भ्रष्टाचार शब्द भी अंग्रेजी के ‘करप्शन’ के अनुवाद के अर्थ में ही उछाला गया है। आर्थिक लेन-देन में की गई गड़बड़ी को ही करप्शन और भ्रष्टाचार कहा जाता रहा है। जबकि जाति की निंदा करना या जनेऊ त्यागने और तोड़ने को कहना या इस्लाम और ईसाइयत को धर्म बताना या जातिगत ऊँच-नीच को हिन्दू समाज का परमसत्य बताना या किसी भी वर्ण की निंदा करना अथवा अवमानना करना या धर्मशास्त्रों में दोषान्वेषण करना या सर्वमान्य महापुरूषों की निंदा करना और अपने पंथ के विशेष व्यक्ति को ही सम्पूर्ण समाज का पूज्य बनाने का हठ करना - ये सब भारतीय परंपरा के अनुसार भ्रष्टाचार हैं। सदाचार से च्युति या पतन ही भ्रष्टाचार है। उस भ्रष्टाचार की कभी कोई निंदा किसी नेता या दल ने नहीं की। उलटे, यह भ्रष्टाचार करना नेताओं के भाषण का मुख्य विषय ही बन गया। यद्यपि व्यवहार मे वे अपने भाषणों पर भी आचरण करते नहीं देखे जाते, जो स्वयं में भी भ्रष्टाचार ही है। 

 इन सब बातों से केवल यह स्पष्ट होता है कि एंग्लों क्रिश्चियन राज्य की समस्त मान्यताओं और उनमें अंतर्निहित आधारों के प्रति आस्था हिन्दुओं के सभी सबल समुदायों का धीरे-धीरे सर्वमान्य लक्षण बन गई है। ऐसे में इस या उस दल को हिन्दुत्व की रक्षा वाला दल बताना स्वयं मे सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। क्योंकि कोई भी दल स्वयं को तो अभी तक हिन्दुत्व की रक्षा के लिये संकल्पित दल कहने का साहस तक नहीं कर पाया है। मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त, दयनीय दशा है। यह एक तरस योग्य स्थिति है। 

 इससे तो अच्छा है कि कुछ समय सभी दल इस सत्य को सर्वानुमति से स्वीकार कर लें कि एंेग्लो क्रिश्चियन राज्य में उनकी अनन्य आस्था है और हिन्दू परंपरा को वर्तमान या भविष्य में राजनीति और राज्य के क्षेत्र में वे कभी भी विचार योग्य नहीं मानेंगे। ऐसा करने से एक तो विराट और भयावह पाखंड से वे सब बच सकेंगे और दूसरे एंग्लो क्रिश्चियन राज्य की अच्छाइयों को अपनाने की बात उठेगी। अभी तो 75 वर्षों से भारतीय राजनेता एंग्लो क्रिश्चियन राज्य की अच्छाइयों से भी दूरी बनाये हुये हैं।




पाश्चात्य सभ्यता के योगदान 

राजीव मिश्रा

जब यह प्रश्न आता है कि हमें पश्चिम से क्या सीखना चाहिए, तो एक वर्ग होता है जो कहता है कि हमें उनसे कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है.. वह सारा ज्ञान हमारे पास पहले से था. 

मैं इसपर शंका नहीं करता कि हमारे ऋषि मुनि मूलतः वैज्ञानिक थे. उन्होंने लॉजिक और ऑब्जर्वेशन से बहुमूल्य ज्ञान अर्जित किया जो आज भी हमें चमत्कृत करता है और किसी भी सभ्यता के लिए गर्व का विषय होता.

    लेकिन इससे आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों का और उसमें पाश्चात्य सभ्यता के योगदान का मूल्य कम नहीं हो जाता. इसमें कोई शंका नहीं है कि प्राचीन काल की समकालीन सभ्यताओं के मुकाबले हिन्दू सभ्यता की उपलब्धियाँ महान थीं. लेकिन इसमें भी कोई शंका नहीं है कि आज पश्चिमी सभ्यता ने जो वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित की हैं, जो भौतिक प्रगति की है, वह मानव इतिहास में अद्वितीय है. सभ्यतागत ज्ञान चक्रवर्ती ब्याज की तरह होता है, और वह पीढ़ी दर पीढ़ी संचित होता है. किसी भी काल का ज्ञान पिछली पीढ़ियों के ज्ञान की नींव के ऊपर ही बना होता है. लेकिन पिछले पचास या सौ वर्षों की प्रगति उसके पहले के हजारों वर्षों की मानव सभ्यता की कुल प्रगति पर कई कई गुना भारी पड़ती है. पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों में दुनिया जितनी बदली है, उतनी उसके पहले के पूरे मानव इतिहास में नहीं बदली थी. 

   हम यह कह सकते हैं कि हमारी हिन्दू सभ्यता की उपलब्धियाँ आधुनिक सभ्यता की उपलब्धियों से बहुत मूलभूत रूप से अलग हैं. जहां आधुनिक सभ्यता सिर्फ भौतिक प्रगति पर आश्रित है, हिन्दू सभ्यता आध्यात्मिक प्रगति पर केंद्रित थी. आज अगर हम जीवन की सुख सुविधा को लक्ष्य बनाकर जी 





रहे हैं, तो उस काल में हम जीवन की सार्थकता के प्रश्न को लक्ष्य बनाते थे. 

    पर यह बात भी हमारे लिए पाश्चात्य सभ्यता की उपलब्धियों को छोटा नहीं करती. हम उनको तुच्छ या नगण्य मान सकते थे अगर हम स्वयं उसे अपना गोल नहीं बनाते. हम उनकी उपेक्षा कर सकते थे, अगर हम उनके प्रयोग की आवश्यकता नहीं महसूस करते. हम मानते कि हमारे ऋषि मुनि पूर्वजों के पास यह ज्ञान था पर उन्होंने अपनी बुद्धिमता में उस ज्ञान को भौतिक उपलब्धियों में ट्रांसलेट नहीं किया... अगर हम स्वयं भी उन भौतिक उपलब्धियों की उपेक्षा कर के जी सकते. हम कह सकते हैं कि हवाई जहाज और कंप्यूटर्स महत्वपूर्ण उपलब्धियां नहीं हैं, अगर हमारा जीवन उनसे समृद्ध नहीं हो रहा होता. पर सच तो यही है कि पाश्चात्य सभ्यता की सभी भौतिक उपलब्धियों का भोग करके हम एक ओर पहले से अधिक समृद्ध जीवन जी रहे हैं.  तो दूसरी ओर यह कहना कि पश्चिम की उपलब्धियां हमारे परंपरागत ज्ञान के आगे तुच्छ हैं, कोई क्रेडिबिलिटी नहीं रखता. 

    इसमें कोई शंका नहीं है कि पश्चिमी सभ्यता की भौतिक उपलब्धियाँ मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी भौतिक उपलब्धियाँ हैं. इसमें भी कोई शक नहीं है कि उनके प्रति इनडिफरेंस का प्रीटेंस करते हुए भी हमारे जीवन के उद्यम का सबसे बड़ा भाग उन्हीं भौतिक उपलब्धियों के लक्ष्य साधन में बीतता है. पक्का मकान, मकान में बिजली, पानी, एयरकंडिशनिंग, खाना पकाने की गैस, कार, हवाई यात्रा, पश्चिमी मॉडल के संस्थानों में  बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन और बौद्धिक इंगेजमेंट के साधन... हमारा 99.99% एफर्ट पश्चिमी सभ्यता की उपलब्धियों को टारगेट करके ही बीतता है. तो या तो ये उपलब्धियां अर्थहीन नहीं हैं या हमारा 99.99% जीवन अर्थहीन है. 

     और अगर हम यह स्वीकार करने का बौद्धिक साहस रखते हैं कि पश्चिमी दुनिया ने पिछली चार पांच सदियों में हमसे अधिक अचीव किया है और सफल रहे हैं, और हम अभी भी कैच-अप ही कर रहे हैं... तो यह स्वीकार करने में भी समस्या नहीं होनी चाहिए कि एक सभ्यता के तौर पर उनके पास बहुत कुछ सीखने लायक है, उपयोगी है. बल्कि सीख पाने की क्षमता शायद सबसे महत्वपूर्ण सिविलाइजेशनल गुण है जो किसी भी सभ्यता में होना चाहिए. बल्कि हमारे पास जो भी अच्छा है, सीखने लायक है, जो हमारी आध्यात्मिक सम्पदा है, उसे सीखने के लिए पश्चिमी समाज ठीक ही तत्पर है. दुनिया योग सीख रही है, ध्यान सीख रही है, दुनिया जीवन का अर्थ खोज रही है. हमारे पास जो अच्छा है वह सीखने के लिए भीड़ लगी हुई है. हमें भी सीखने में संकोच नहीं करना चाहिए.

 वैसे भी, सभ्यता का चक्र घूमता रहता है... सभ्यताएं वैभव काल से पराभव में और फिर पराभव से वैभव काल में जाती हैं. आने वाला समय हमारा है, हिन्दू सभ्यता का है. मेरा विश्वास है कि यह जो सिविलाइजेशनल ग्रन्थियां हैं वह अधिक से अधिक हमारी पीढ़ी तक हैं. अगली पीढ़ियों की यह समस्या नहीं होने वाली. उनकी सीखने की क्षमता हमसे बेहतर ही है.








दो पत्तों की कहानी 

एक समय की बात है। गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था। पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे।

एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा। जो आड़ा गिरा वह अड़ गया; कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा... चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा।”

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा– रुक जा गंगा… अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती... मैं तुझे यहीं रोक दूंगा!

पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी… उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। 

पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी। वो लगातार संघर्ष कर रहा था। नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीं पहुंचेगा, जहां लड़कर.. थककर.. हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का... उसके संताप का काल बन जाएगा।

वहीं दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था।

यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा… चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा... तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा।

नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं… वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढ़ती जा रही थी। पर पत्ता तो आनंदित है, वह तो यही समझ रहा है कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है। 

आड़े पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं 




पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का… उसके आनंद का काल बन जाएगा।

जो पत्ता नदी से लड़ रहा है… उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार को कोई उपाय संभव नहीं है।

हमारा जीवन भी उस नदी के सामान है जिसमें सुख और दुःख की तेज़ धारायें बहती रहती हैं।

और जो कोई जीवन की इस धारा को आड़े पत्ते की तरह रोकने का प्रयास भी करता है, तो वह मुर्ख है, क्योंकि ना तो कभी जीवन किसी के लिये रुका है और ना ही रुक सकता है। 

वह अज्ञान में है जो आड़े पत्ते की तरह जीवन की इस बहती नदी में सुख की धारा को ठहराने या दुःख की धारा को जल्दी बहाने की मूर्खता पूर्ण कोशिश करता है।

क्योंकि सुख की धारा जितने दिन बहनी है... उतने दिन तक ही बहेगी। आप उसे बढ़ा नहीं सकते और अगर आपके जीवन में दुःख का बहाव जितने समय तक के लिए आना है वो आ कर ही रहेगा, फिर क्यों आड़े पत्ते की तरह इसे रोकने की फ़िज़ूल मेहनत करें।

बल्कि जीवन में आने वाली हर अच्छी बुरी परिस्थितियों में खुश हो कर जीवन की बहती धारा के साथ उस सीधे पत्ते की तरह ऐसे चलते जाओ... जैसे जीवन आपको नहीं बल्कि आप जीवन को चला रहे हो। सीधे पत्ते की तरह सुख और दुःख में समता और आनन्दित होकर जीवन की धारा में मौज से बहते जाएँ।

और जब जीवन में ऐसी सहजता से चलना सीख गए तो फिर सुख क्या? और दुःख क्या?

 *शिक्षा:-*

जीवन के बहाव में ऐसे ना बहें कि थक कर हार भी जाएं और अंत तक जीवन आपके लिए एक पहेली बन जाये। बल्कि जीवन के बहाव को हँस कर ऐसे बहाते जाएं की अंत तक आप जीवन के लिए पहेली बन जायें।सुख हमारी खुद की सम्पत्ति है... इसे बाहर नहीं अपने भीतर ही तलाशें। इससे आप सदैव सुखी रहेंगे..!!




जीवन की तुला



मैं

जीवन की तुला में

रोज़ तुलता हूँ

कभी अच्छाई के पलड़े में

कभी बुराई के पलड़े में

मुखोटा ओढ़े लोगों में

मैं रोज ठगा जाता हूं

एक दिन खुद को बदलने की कशमकश में

मुखौटा ओढ़े लोगों की भीड़ में

मैं भी

चल दिया अपने नए सफर में

बिना लाठी और सहारे के

मगर इस दुनिया में टिक नहीं पाया

अपनी कोशिशों से खुद को ठगा पाया

एक तथ्य बस यही समझ आया

अच्छाई के पलड़े से

माना बुराई का पलड़ा तो भारी है

पर संतोष की तुला में

मेरा जीवन मुझ पर भारी नहीं है

खोखले हैं लोग वो

जो मुखोटों में जीते हैं

अंतर्मन की स्वच्छ धारा को

परिस्थिति से रोकते हैं

वास्तविकता यही है जीवन की आज भी

मैं

जीवन की तुला में

रोज़ तुलता हूं

पर आत्ममूल्यांकन के पलड़े में

आत्मसंतुष्टि के पलड़े में


सपना 







सच है कि हर रंग कुछ कहता है

..

सुना मैंने भी उनको एक दिन 

जब  होने लगी थी रंगों की लड़ाई।

 हर रंग बढ़- चढ़कर करने लगा अपनी- अपनी बड़ाई

सब ने अपना-अपना महत्व कुछ यूं गाया-----

बलिदान की भावना लिए बोला नारंगी रंग

वीरो की जान , साधु संतों का मान

मैं हूँ केसरिया भारत माता की शान। 

शांति का संदेश लिए सफेद रंग आया सत्य, अहिंसा और मां सरस्वती का प्रिय हूं कुछ ऐसा उसने समझाया।

आई हरे रंग की बारी जिस पर आश्रित यह दुनिया सारी 

प्राण वायु और भोजन हो तुम मुझसे पाते 

कहो बिना हरियाली क्या तुम खुश रह पाते?

शक्ति का प्रतीक ,आक्रोश से भरा  लाल रंग तमतमाया ।

मैं न होता तो भला कोई कैसे जीता

नस- नाड़ियों में रक्त बन  कर हूँ मैं ही तो समाया।

इसी तरह बढती गई लड़ाई

हर रंग  चाहे काला हो या पीला, गुलाबी हो या नीला सब ने अपनी -अपनी खूबी बताई।

उन्हें शांत कराने,उनका झगड़ा निपटाने

इंद्रधनुष धरती पर आया फिर उसने कुछ यूं समझाया-  

आपस मे क्यो लड़ते हो भाई

तुम सब के मिलने से ही तो,,,

 मैंने ,,,,

इतनी सुंदर 

काया है पाई।

सरिता शर्मा ' विनी '









अग्निपथ से कर्तव्यपथ

मन बहुत था कुछ बनने का,

पर मनानुसार कुछ हो न सका।

अग्निपथ पर चलने की चाह थी,

वह भी बंधनों में समा गई ।।


कुछ सपने साकार नहीं होते,

ऐसा मैं मानने को तैयार न था।

सफलता की कुंजी तो श्रम ही है,

ऐसा मुझे विश्वास था।।


श्रम का भी एक स्वरूप होता है,

यथार्थ में जीने को प्रेरित करता है।

मन भी वही श्रम भी वही,

मृृग-मरीचिका सदृश भटक रहा।।


सृृष्टि में दैव-श्रम का,

एक साथ योग बनता नहीं,

जिंदगी में है पूर्णता, 

ऐसा मुझे विश्वास होता नहीं।।


मन शांत करने के प्रयोग,

नित नए-नए करता हूँ।

तृष्णा इतनी प्रबल है, 

स्वयं को अलग न कर पाता हूँ।।


सत्य और असत्य के मध्य,

नित द्वंद्व होता है यहाँ।

सत्य निश्चित विजयी होगा,

इस उम्मीद में जीते हैं नर यहाँ।।


ऋणी से उर्ऋण बनूँ,

इसके लिए प्रयासरत हूँ।

चित्त शांत ईश्वरोन्मुख हो,

इसलिए कर्तव्यपथ पर चलता हूँ।।


डॉ राकेश गौतम 






कला भेद से भगवान् के अवतार 

कला भेद से भगवान् के छः प्रकार के अवतार कहे गये हैं :-  

 पूर्णतमावतार,पूर्णावतार,विभूत्यावतार,कलावतार,अंशांशावतार,आवेशावतार। 

पूर्णतमावतार ---   सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर  जीव , ईश्वर तथा शुद्ध ब्रह्म सभी पूर्ण हैं , उतना ही नहीं ! बल्कि तिनके से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी पूर्ण हैं , जैसा कि वेद में कहा गया है ---

"पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।*  

*पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"* 

अद: का अर्थ होता है ईश्वर (परोक्ष) पूर्ण है। इदं = प्रत्यक्ष जीव, यह भी पूर्ण है । पूर्ण ब्रह्म से पूर्णता को लेकर जो जगत् की रचना के अनन्तर शेष बचता है --- वह भी पूर्ण है । वह ब्रह्म ज्ञान-स्वरूप है , ज्ञान के सम्बन्ध में कहा है --

"ज्ञानमेकं सदा भाति सर्वावस्थासु निर्मलम् ।

मन्दभाग्या: न जानन्ति स्वरूपं केवलं वृहत् ।।"

ज्ञान एक है , वह सदा सभी अवस्थाओं में निर्मलता से प्रकाशित होता है , किन्तु मन्दभाग्य वाले पुरुष  अर्थात्  मल-विक्षेप-आवरण से युक्त अंतःकरण वाले परमात्मा के सर्वव्यापी स्वरूप को नहीं जानते ।

भाव यह है कि ब्रह्म का अविनाशित्व , ज्ञानत्व तथा परमानन्दत्व देश-काल-वस्तु के परिच्छेद से रहित , अनन्त , अपार हैं , इसी का नाम सच्चिदानन्दत्व है । किसी भी प्राणी में कम-अधिक नहीं , जैसे महाकाश किसी में कम-अधिक नहीं है । मेघाकाश में बादल के परिमाण का , मठाकाश में मकान के

परिमाण का तथा घटाकाश में घड़े के परिमाण का प्रतीत होता है , किन्तु सूक्ष्म बुद्धि से विचार करने पर घट-मठ की दीवारों में तथा उनके अणु-परमाणुओं के अन्तराल में जो खाली स्थान है , वहां भी 





आकाश है । अर्थात् वह ठोस चट्टान तथा लोहे के गोले के अन्दर और बाहर भी व्याप्त है , इसी प्रकार ब्रह्म भी बाहर तथा भीतर व्याप्त है । वह प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति से पहले तथा बाद भी रहता है , ब्रह्म का नाश तथा बाध नहीं होता । जैसे उत्पन्न हुई या बनाई गई वस्तु का टूट-फूट जाने पर नाश हो जाता है , परन्तु वस्तु के रहते भी वस्तु का बाध होता है । जैसे घोड़े पर विचार करके देखने पर उसके शरीर में कहीं भी घोडापना नहीं है , कहीं उसका सिर , कहीं पीठ , कहीं कान आदि अंग है ,  सभी अंगों के मेल का नाम घोड़ा रखा गया है । सीपी में चांदी की प्रतीति भ्रान्ति से होती है , आप जाकर ध्यान से देखने तथा उठाने पर सीपी में चांदी नहीं रहती --- यह सीपी में चांदी का बाध है । परन्तु उतनी ही दूरी पर सूर्य की किरणें पड़ने पर चांदी के समान फिर चमकती है ;  किन्तु फिर वही व्यक्ति चांदी समझकर लेने को नहीं दौड़ता । उसी प्रकार ब्रह्मवेत्ता को बोध हो जाने पर व्यवहार में जगत् के रहने पर भी जगत् की भ्रान्ति नहीं रहती । वास्तव में ब्रह्म ही वस्तु है , अन्य सब अवस्तु है । इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्म-जगत्-जीव-ईश्वर तथा माया के रूप में सभी पूर्ण है । उसकी पूर्णता में कभी कमी नहीं होती , जैसे ---- महाकाश में अरबों-खरबों बादल आ जाने पर , बरसने या न बरसने पर महाकाश पूर्ण बना रहता है , इनकी उत्पत्ति तथा नाश से महाकाश को कोई अन्तर नहीं पड़ता , बल्कि पूर्ण बना रहता है ,  इसी प्रकार चिदाकाश रूपी ब्रह्म में माया से जगत् की उत्पत्ति तथा विनाश से कोई अन्तर नहीं पड़ता , बल्कि पूर्ण बना रहता है । अथवा जैसे अरबों-खरबों शून्यों में अरबों-खरबों शून्य जोड़ने-घटाने , गुणा या भाग करने पर शून्य ही रहता है , कोई अन्तर नहीं पड़ता , उसी प्रकार ब्रह्म से जगत् उत्पन्न होने से पूर्व , सृष्टि काल में तथा जगत् के विनाश होने पर भी शुद्ध ब्रह्म में कोई परिवर्तन नहीं होता । इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म बौद्धों का शून्य है , यह तो समझाने के लिए दृष्टान्त दिया है , ब्रह्म पूर्ण है । अथवा ब्रह्म की पूर्णता के सम्बन्ध में इस प्रकार समझना चाहिए — ब्रह्म जादू की ऐसी अक्षय-निधि पिटारी है , जिसमें पद्मों-नीलों रुपये  पद्मों-नीलों बार निकालने पर भी उतने ही बने रहते है , उनमें न्यूनाधिकता नहीं होती है । अतः ब्रह्म तीनों कालों , सभी देशों तथा सभी वस्तुओं की सीमा से परे पूर्ण ही बना रहता है , यह सिद्ध हुआ । जीव-जगत्-ब्रह्म पूर्ण होने पर भी जिस जीव को जितना बड़ा अंतःकरण रूपी पात्र मिला है , उसमें उतनी ही मात्रा में ब्रह्म प्रकाशित होता है । जैसे गङ्गाजी में अथाह जल होने पर भी जिसके पास एक , दो , पांच , दस , चालीस आदि जितने लीटर का पात्र हो , उतना ही जल आ सकता है ,  वैसे ही ब्रह्म पूर्ण होने पर भी जिस जीव के पास जितना बड़ा अंतःकरण है , उसमें उतनी ही मात्रा में ब्रह्म की चेतनता प्राप्त होती है । ब्रह्म परमज्ञान-स्वरूप तथा स्वयंप्रकाश है , उसका अंश होने के कारण जीव में भी वह सामर्थ्य है । उसी ब्रह्म को वेदों-उपनिषदों तथा पुराणों में अनन्तकोटि-नायक परात्पर विष्णु कहा है , वह परिपूर्णतम है , उसी के राम-कृषणादि अवतार पूर्णतम 

अवतार हैं अर्थात् जिस कल्प में महाविष्णु ही जब राम-कृष्ण के रूप में अनादि शक्ति सहित अवतार लेते हैं , वे राम-कृष्ण के अवतार पूर्णतम हैं । उनके इशारे से अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड के अनन्तकोटि ब्रह्मा-विष्णु-महेश जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-संहार करते हैं । ऐसा कोई क्षण खाली नहीं जाता जिस क्षण में उनके रोमकूप से एक चिंगारी के समान प्रकाश-पुंज न निकलता हो और अति दूर जाकर ब्रह्माण्ड 




का रूप न धारण करता हो ,  कई ब्रह्माण्ड प्रलय के अनन्तर छोटी सी चिंगारी के रूप में उनके शरीर में लीन न होते हों । उन्हीं विष्णु की अनादि शक्ति महालक्ष्मी, सीता तथा राधा के रूप में अवतरित होती हैं । राम-कृष्ण दोनों की कलाओं में कोई भेद नहीं है , क्योंकि भागवत में व्यास जी ने नवम् स्कन्ध में श्रीराम के सम्बन्ध में "कलेश"  शब्द का प्रयोग किया है तथा कृष्ण को  "एते चांशकला: प्रोक्ता: कृष्णास्तु भगवान् स्वयम्"  कहा है । यहां पर कई लोग कहते हैं कि ---  आपका कथन ठीक नहीं प्रतीत होता , क्योंकि कई ग्रन्थों में श्रीराम को बारह कला तथा श्रीकृष्ण को सोलह कला का अवतार कहा है , इस प्रकार कलाओं की दृष्टि से न्यूनाधिक प्रतीत होते हैं । तो इसका समाधान होगा ---  कि दोनों अवतार समान ही है , क्योंकि रामावतार सूर्यवंश में हुआ , सूर्य बारह कलाओं से पूर्ण होता है , अतः राम को बारह कला का अवतार कहा । कृष्ण का अवतार चन्द्रवंश में हुआ , चन्द्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है , अतः कृष्ण को सोलह कला का कहा गया , अतः इन कलाओं की न्यूनाधिकता में कोई पूर्णावतार और कोई अंशावतार नहीं हो सकता , बल्कि दोनों ही पूर्णतमावतार सिद्ध होते हैं । दूसरा युक्तिसंगत समाधान यह है कि ----  बाजार में कोई भक्त तौलकर मौसम्मी या सन्तरा आदि खरीदे , जो दोनों तौल में बराबर हो , छिलने पर दोनों के भीतर एक में बारह और एक और एक मे सोलह फांकें निकली है । बारह वाली में फांकें बड़ी है , सोलह वाली में छोटी है , किन्तु दोनों में रस बराबर मात्रा में है । छोटी या बड़ी फांकें होने पर भी मौसमी दोनों बराबर ही है , वैसे ही राम में बारह कला और श्रीकृष्ण में सोलह कलाएं होने पर भी दोनों ही पूर्णतम हैं । अथवा जैसे कोई कहे कि रुपये में सोलह आने होते हैं या रुपये में बारह माशे हैं । बारह या सोलह न्यूनाधिक होने पर भी रुपया छोटा-बड़ा नहीं होता ।

वैसे ही राम १२ कला तथा कृष्ण १६ कला का अवतार कहने पर भी दोनों में कोई छोटा या बड़ा नहीं हो जाता ।

पूर्णावतार ---  कल्पभेद से राम-कृष्ण को कारण ब्रह्म का पूर्णतमावतार कहा है , किन्तु कहीं-कहीं कला भेद , मन्वन्तर-भेद , तथा युगभेद से कार्य ब्रह्म विष्णु-राम तथा कृष्ण के रूप में अवतार लेते हैं ।

वे कहीं पूर्णावतार , कहीं विभूत्यावतार कहे जाते हैं , जैसे --  नारद जी के शाप से तथा सनकादि के शाप से वही वैकुण्ठ-विहारी-विष्णु  , श्वेतद्वीप-वासी-नारायण , क्षीरशायी-विष्णु जब राम-कृष्ण के रूप में होते हैं तो वे पूर्णावतार कहे जाते हैं ।

विभूत्यावतार ---  कुछ विद्वानों के मत से बारह कला से लेकर चौदह-पन्द्रह कला का अवतार 

विभूत्यावतार होता है , इनमें नृसिंह और वामनादि अवतार आते हैं ।

अंश या कलावतार --- अंशावतारों में मत्स्य-कूर्म-वाराह-सनकादि-नारद तथा व्यास आदि आते हैं । अंशांशावतार ---  भगवान् के अंशावतारों के अवतार को अंशांशावतार कहते हैं । जैसे भागवत आदि ग्रन्थों में अत्रि तथा अनुसूया की तपस्या से प्रकट हुए भगवान् दत्तात्रेय अंशावतार हैं , भविष्यपुराण के अनुसार उन्होंने ही कलियुग में देवताओं के प्रार्थना करने पर पश्चिमी पंजाब के लाहौर जिले के तलवंडी 





ग्राम में गुरु नानक देव के रूप में अवतार लिया ,  यह दत्तात्रेय के अंशावतार तथा विष्णु के अंशांशावतार हुए । कलियुग में श्रीकृष्ण भगवान् के अंशांशावतार चैतन्य महाप्रभु तथा महाप्रभु वल्लभाचार्य हुए । ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण के अंशावतार गणेश जी तथा विष्णु जी के अंशावतार स्वामी कार्तिकेय हुए ।

आवेशावतार ---  जैसे सामान्य व्यक्तियों में कुछ काल के लिए भूत , प्रेत , चंडी , हनुमान तथा भैरव आदि का आवेश आ जाता है , तब उन्हीं के समान सर्वज्ञ हो जाता है ।

इसी प्रकार पिता जमदग्नि की मृत्यु के उपरान्त जब माता रेणुका इक्कीस बार छाती पीटकर रोई , तब सान्त्वना देते हुए परशुराम जी ने माताजी से कहा --- "तुम चिन्ता मत करो , मैं भगवत् शक्ति प्राप्त करके इक्कीस बार क्षत्रियों का विनाश करूँगा ।

इसके बाद आप विष्णु की आराधना में लग गये , भगवान् विष्णु ने दर्शन दिया , इन्होंने भगवान् की स्तुति करके शक्ति मांगी , भगवान् ने सारङ्ग धनुष उन्हें दिया तथा अपनी सम्पूर्ण शक्तियां उनमें निहित की और कहा कि — "त्रेता के अन्त में जब तुम्हारे ही नाम से अवतार लूंगा , तब धनुष के सहित शक्ति का अपहरण कर लूंगा ।" क्योंकि भगवान् विष्णु ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का उनमें आवेशित (प्रवेश) की थी , इसीलिए उन्हें आवेशावतार कहते हैं ।







16 सिद्धियाँ विवरण

वाक् सिद्धि : - जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं.

 दिव्य दृष्टि सिद्धि:- दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं.

प्रज्ञा सिद्धि : - प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें.

दूरश्रवण सिद्धि :- इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता.

जलगमन सिद्धि:- यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो.

वायुगमन  सिद्धि :- इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं.






अदृश्यकरण सिद्धि:- अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं.

विषोका सिद्धि :- इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं.

 देवक्रियानुदर्शन सिद्धि :- इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं.

कायाकल्प सिद्धि:- कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं.

सम्मोहन सिद्धि :- सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं. गुरुत्व सिद्धि:- गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं. पूर्ण पुरुषत्व सिद्धि:- इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की.सर्वगुण संपन्न सिद्धि:- जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं.इच्छा मृत्यु सिद्धि :- इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं. अनुर्मि सिद्धि:- अनुर्मि का अर्थ हैं. जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो.





यज्ञ में मंत्रों का ऊंचे स्वर में उच्चारण  क्यो?

कहा जाता है कि यज्ञ के जरिए देवता प्रकट होकर मनोवांछित वर देते हैं। वेद मंत्रों, यज्ञीय मंत्रों की शक्ति ऐसी होती है, जिसके द्वारा देवराज इंद्र सरीखे शक्तिशाली देवता को भी आने को विवश किया जा सकता है। यज्ञ में मंत्रों का विधिवत् उच्चारण एवं जाप, द्वारा आहुतियां देने से आकाश में जो अदृश्य आध्यात्मिक विद्युत् तरंगें फैलती हैं, वे उपस्थित लोगों के मनों से बुराइयों, पाप, द्वेष, वासना, कुटिलता, अनीति, स्वार्थपरता आदि को हटाती हैं। परिणाम यह होता है कि अनेक समस्याएं, चिंताएं, आशंकाएं, भय, आदि समूल नष्ट हो जाते हैं। मंत्रों से आच्छादित दिव्य आध्यात्मिक वातावरण में जो संतानें पैदा होती हैं, वे सद्गुणी और उच्च विचारधाराओं से परिपूर्ण होती हैं। दिव्य प्रभाव से महापुरुषों का निर्माण होता है और लोगों के अंतःकरण में प्रेम, सद्भाव, ईमानदारी, आस्तिकता, संयम आदि सद्विचार स्वयं ही प्रकट होने लगते हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में यज्ञ के अनेक प्रकार बताए गए हैं। दैनिक यज्ञों के अलावा विशिष्ट प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ कराने का विधान है। हजार, लाख और करोड़ की संख्या में मंत्रोच्चार करके यज्ञ में आहुतियां दी जाती हैं और इच्छित फल प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार मंत्र जप से उत्पन्न प्रचंड शब्द शक्ति तथा साधक के संकल्प बल से अंतरिक्ष में व्याप्त दैवी चेतना संघीभूत होकर साधक के लिए सिद्धियों के अवसर प्रदान करती है।

एक बार महाराज पृथु ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया। विधि विधानानुसार वे जब 99 यज्ञ करके अत्यंत प्रभावशाली होने लगे, तो स्वर्ग का राज छिन जाने की आशंका से इंद्र का मन विचलित होने लगा। अतः सौवें अश्वमेध यज्ञ में विघ्न डालने के लिए इंद्र ने वेष बदलकर प्रपंच द्वारा घोड़े का अपहरण कर लिया, किंतु पृथु के पुत्र ने बलपूर्वक घोड़ा छुड़ा लिया। दूसरी बार इंद्र की नीच वृत्ति से पृथु को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाकर इंद्र का नाश कर देने की घोषणा की इस पर ऋषियों ने राजा पृथु से कहा-हे नृपेन्द्र! आपके इस भयंकर बाण से तो इंद्र सहित सारे देवलोक का 





ही नाश हो जाएगा। आपकी इच्छा इंद्र को मारने की ही है, तो हम लोग आपके मनोरथ के नाश में लगे, अभिमानी इंद्र को सारपूर्ण मंत्रों द्वारा खींचकर इसी यज्ञ अग्नि में होम कर देंगे।

ऋषियों की वाणी सुनकर राजा पृथु ने कहा-'इस दुष्ट ने अकारण ही मेरे यज्ञ में विघ्न डाला है। अतः जब तक आप लोगों के द्वारा यज्ञीय मंत्रों से खिंचकर अधर्मी इंद्र मेरे सामने अग्निकुंड में जल नहीं जाता, मैं हाथ से धनुष नहीं त्यागूंगा।" पृथु की इच्छा पूर्ण करने के लिए ऋषि अपने हाथ में खुवा उठाकर इंद्र को उद्देश्य बनाकर यज्ञ कुंड में आहुति देने लगे। जब यज्ञीय मंत्रों से खिंचकर इंद्र अग्नि कुंड में गिरने ही वाले थे कि स्वयं ब्रह्माजी ने उपस्थित हो ऋषियों से निवेदन कर इंद्र को जलने से बचा लिया। सभी के अनुरोध और इंद्र के क्षमा मांगने पर पृथु ने उसे क्षमादान दे दिया। इस तरह देवशक्तियों पर श्रेष्ठता की विजय हुई। इस कथा से यज्ञ प्रक्रिया में मंत्रों की शक्ति का पता चलता है। 'मंत्र' संतुलित ध्वनि के द्वारा मानसिक रोगोपचार करने में भूमिका निवाहते हैं।

गुरु तेग बहादुर

विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। गुरु तेग बहादुर सिंह सिखों के नौंवें गुरु थे। तेग बहादुर जी के बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह था।





वास्तविकता

बालात्कार के विरोधी, हाथों में मोमबत्ती लेकर

निकले कुछ बहरूपिये, मन में कुटिलता लेकर

अंधेरे में कुछ दूरी से , आवाज पड़ी कानों में

अति सुंदर युवती को, घर जाते हुए वीरानों में

बीमार पिता की दवा लेकर, तेजी से जा रही थी

नज़र पड़ गई दरिंदे की, सहमी सी रह गई थी

फिर वहाँ वही हुआ, जिसका विरोधी था शैतान

किसके मन में क्या है, कैसे होगी यह पहचान

सोचो जरा यह मोमबत्ती जलाकर जीवन बुझाना

इतने अमानवीय कृत्यों  से क्यों भर गया है ज़माना

बाहरी जलसे बंद करके, मन का भाव ही काफी होगा

नारी को माँ-बहन न सही, मानव मानना काफी होगा

मनोभाव

रिँकू शर्मा

हिंदी अध्यापिका ओ०पी०एस० विद्या मंदिर अंबाला





अप्रैल मास के महत्वपूर्ण दिवस 

1 अप्रैल , ब्लाइंडनेस की रोकथाम सप्ताह 1 अप्रैल - उड़ीसा स्थापना दिवस  1 अप्रैल को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर उड़ीसा स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस उड़ीसा में उत्कल दिवस के नाम से भी प्रचलित है। 1 अप्रैल 1936 को ओडिशा को एक अलग प्रांत के रूप में मान्यता प्रदान की गयी थी । ध्यान दे कि 9 नवंबर 2010 को भारतीय संसद में Orissa को उड़ीसा और ओरिया भाषा को उड़िया भाषा में मान्यता प्रदान की गयी थी l 1 अप्रैल - भारतीय बैंकों की वार्षिक लेखाबंदी

2 अप्रैल विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस,2 अप्रैल - विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस  हर साल 2 अप्रैल को अन्तराष्ट्रीय ऑटिज्म जागरूकता दिवस संयुक्त राष्ट्र (UNO) द्वारा मनाया जाता है, उद्देश्य ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को सशक्त बनाना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में विश्व ऑटिज्म दिवस मनाने का फैसला किया था। ऑटिज्म एक दिमाग संबंधी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति स्वयं के ख्यालों में खोया रहता व पीड़ित को मिर्गी के दौरे भी पड़ते हैं तथा पीड़ित का विकास सामान्य नहीं होता है और न्यूरोसिस्टम पर भी बुरा असर होता है।

3 अप्रैल - हिंदी रंगमंच दिवस हिंदी रंग मंच की शुरुआत प्रथम बार 3 अप्रैल 1968 से हुई थी l हिंदी भाषा व इससे सम्बंधित बोले जाने वाली बोलियों का अभिप्राय हिंदी रंगमंच है, हिंदी रंगमंच का सम्बन्ध रामलीला, रासलीला जैसे आयोजनों से है l

4 अप्रैल - अन्तर्राष्ट्रीय खदान जागरूकता दिवस सयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा 8 दिसम्बर 2005 को घोषणा की गई कि प्रत्येक वर्ष 4 अप्रैल को विश्व स्तर पर अन्तराष्ट्रीय खदान जागरूकता व खदान कार्य मदद दिवस के रूप में मनाया जाएगा l प्रथम बार 4 अप्रैल 2006 को अन्तराष्ट्रीय खदान जागरूकता दिवस आयोजित किया गया था l 







5 अप्रैल राष्ट्रीय समुद्री दिवस,5 अप्रैल - राष्ट्रीय मेरीटाइम (नौवहन) दिवस,5 अप्रैल - समता दिवस,

6 अप्रैल - अन्तराष्ट्रीय खेल दिवस  हर साल 6 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विकास तथा शांति की भावना को प्रोत्साहन करने के लिए विश्व खेल दिवस प्रस्तावित किया था। यह प्रस्ताव, 23 अगस्त 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प 67/296 द्वारा बनाया गया । ध्यान दे कि 6 अप्रैल 1896 को आधुनिक युग के प्रथम ओलंपिक खेल एथेंस (ग्रीस) का उद्घाटन समारोह मनाया गया था।

7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दिवस,7 अप्रैल - विश्व स्वास्थ्य दिवस  इस समय कोरोना वायरस का प्रकोप अभी भी छाया हुआ है तो इस समय स्वास्थ्य दिवस का महत्व और अधिक हो गया है l 7 अप्रैल 1948 को ही विश्व स्वस्थ्य संगठन (World Health Organization) की स्थापना की गई थी फिर वर्ष 1950 से प्रत्येक साल 7 अप्रैल को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है l प्रत्येक व्यक्ति अपने व आसपास लोगों के स्वस्थ्य के बारे में जागरूक रहे इस उद्देश्य से हर साल स्वास्थ्य दिवस आयोजित किया जाता है l

10 अप्रैल विश्व होम्योपैथी दिवस,10 अप्रैल - होम्योपैथीक दिवस हर साल 10 अप्रैल को अन्तराष्ट्रीय होम्योपैथी दिवस मनाया जाता है। होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों को जागरूक करना है। जर्मनी के होम्योपैथी के संस्थापक डॉ. क्रिश्चिन फ्रेडरिक सैमुएल हैनीमेन के जन्मदिन में मनाया जाता है। यह उपचार का दूसरा सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला सिस्टम है। शरीर की अपनी चिकित्सा शक्ति उत्तेजक द्वारा उपचार के एक अनूठे तरीका का यह चिकित्सा प्रणाली उपयोग करती है।

11 अप्रैल - राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस  राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस हर साल 11 अप्रैल को गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए उचित स्वास्थ्य तथा मातृत्व सुविधा के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है l महिलाओं के बीच एनीमिया को कम करने के लिए एक बेहतर प्रसव पूर्व स्वास्थ्य देखभाल दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

12 अप्रैल - विश्व मानव अंतरिक्ष यात्री दिवस  विश्व मानव अंतरिक्ष यात्री दिवस हर साल 12 अप्रैल को मनाया जाता है। 12 अप्रैल 1961 में सोवियत संघ के यूरी गागरिन ने “वोस्तोक-1” अंतरिक्ष यान पर अंतरिक्ष में पहले मानव उड़ान को यादगार करने के लिए मनाया जाता है।

13 अप्रैल - बैशाखी,13 अप्रैल जलियांवाला बाग नरसंहार दिवस (1919)

14 अप्रैल बी.आर.अम्बेडकर जयंती ,14 अप्रैल - अग्निशमन सेवा दिवस

15 अप्रैल - गुरु नानक जन्मदिवस

15 अप्रैल - हिमाचल दिवस वर्ष 1948 को हिमाचल प्रदेश का स्थापना की गई थी l तत्पश्चात में हिमाचल प्रदेश को वर्ष 25 जनवरी 1950 को "ग" श्रेणी का दर्जा दिया था l फिर 1 नवम्बर 1956 केंद्र शासित प्रदेश की घोषणा की गई l वर्ष 1966 पंजाब के कुछ पहाड़ी क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश में शामिल 

किया गया l संसद के द्वारा वर्ष 18 दिसम्बर 1970 को हिमाचल प्रदेश अधिनियम पारित किया जिसके 





बाद हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ l भारत का 18वा राज्य का दर्जा हिमाचल प्रदेश को प्राप्त हुआ l

15 अप्रैल - दक्षिण-पश्चिमी कमान दिवस  दक्षिणी-पश्चिमी कमान भारतीय सेना की 7वीं तथा सबसे कम उम्र की कमांड है।  इसका नाम सप्तशती है आदर्श वाक्य “हमेशा विजय” है। दक्षिण-पश्चिमी कमान 15 अप्रैल 2005 को स्थापित किया गया, मुख्यालय जयपुर, राजस्थान राज्य में स्थित है।

17 अप्रैल विश्व हीमोफिलिया दिवस,17 अप्रैल - सर्वपल्ली राधा कृष्ण स्मृति दिवस,17 अप्रैल - तात्य टोपे स्मृति दिवस,17 अप्रैल - विश्व हिमोफिलिय दिवस

18 अप्रैल - विश्व विरासत दिवस  प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस आयोजित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुदाय में सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है l अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद द्वारा 18 अप्रैल 1982 को विश्व विरासत दिवस आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था, जिसके परिणामस्वरुप वर्ष 1983 में यूनेस्को की महासभा द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किया गया था । ध्यान दें कि वर्ष 1964 में अंतरराष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद की स्थापना वेनिस चार्टर के सिद्धांतों पर की गई थी।

19 अप्रैल - विश्व यकृत दिवस ( विश्व लीवर दिवस )  हर साल 19 अप्रैल को मनाया जाता है l मानव शरीर में यकृत के महत्व और यकृत रोगों के उपचार के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से विश्व यकृत दिवस आयोजित किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यकृत रोग हिंदुस्तान में मृत्यु के 10 वें सबसे सामान्य कारणों में से एक है।

21 अप्रैल - सिविल सर्विस दिवस,21 अप्रैल 2018 को 12वे सिविल सेवा दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। 21 अप्रैल 1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मेटकाफ हाउस, नई दिल्ली में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण स्कूल में पहले बैच को संबोधित करने के उपलक्ष्य पर सिविल सेवा दिवस हर साल मनाया जाता है। ‘लोक प्रशासन में उत्कृष्टता हेतु प्रधान मंत्री पुरस्कार’ तीन श्रेणियों में भी प्रस्तुत किया जाता है सिविल सेवा दिवस के उपलक्ष्य पर ।

21 अप्रैल - अन्तर्राष्ट्रीय रचनात्मकता और अभिनव दिवस  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष 21 अप्रैल को आधिकारिक रूप से अन्तर्राष्ट्रीय रचनात्मकता और अभिनव दिवस का मनाया जाता है। यह दिवस आवश्यक नवाचार के लिए राष्ट्रों को क्षमता का उपयोग करने के लिए सजग करता है व अभिनव रचनात्मकता और उद्यमिता को जरुरी आर्थिक विकास तथा नौकरी निर्माण के लिए सूचीबद्ध भी करता है। 21 अप्रैल राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस, सचिव दिवस

22 अप्रैल विश्व पृथ्वी दिवस,22 अप्रैल - विश्व पृथ्वी दिवस हर साल 22 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय स्तर 

पर पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। जन्नता को पृथ्वी को लाभान्वित करने वाली क्रियान्वयन के लिए सजग 

करने हेतु यह दिवस मनाया जाता है। ध्यान दे कि वर्ष 1970 में प्रथम पृथ्वी दिवस मनाया गया, जबकि वर्ष 2016 में पृथ्वी दिवस के उपलक्ष्य में जलवायु परिवर्तन के लिए एतिहासिक पेरिस समझौता (वैश्विक 






तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस कम करने हेतु) हस्ताक्षर किए गए थे ।

23 अप्रैल - अंग्रेजी भाषा दिवस  विश्व पुस्तक तथा कॉपीराइट दिवस और विश्व अंग्रेजी भाषा दिवस 23 अप्रैल को विश्व भर में आयोजित किया जाता हैं। यह दिवस सर्वेंटेस, शेक्सपियर, और इंका गार्सिलसो डी ला वेगा 23 अप्रैल 1616 को हुई मृत्यु के बाद से मनाया जाता है। पेरिस में आयोजित वर्ष 1995 में यूनेस्को के जनरल सम्मेलन में, 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस के रूप में चिन्हित किया गया था। 23 अप्रैल - विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस

24 अप्रैल राष्ट्रीय पंचायती दिवस,24 अप्रैल - विश्व लैब पशु दिवस = विश्व लैब पशु दिवस 24 अप्रैल 2018 को विश्व स्तर पर मनाया जाता है। यह दिवस वर्ष 1979 में ब्रिटिश नेशनल एंटी-विविसेक्शन सोसाइटी ने प्रयोगशाला पशु के लिए अन्तराष्ट्रीय दिवस के रूप में चिन्हित किया गया था। यह दिवस ब्रिटिश नेशनल एंटी-विविसेक्शन सोसाइटी के पहले अध्यक्ष ह्यूग डॉउडिंग के जन्मदिवस के यादगार में मनाया जाता है। यह दिवस मुख्य रूप से प्रयोगशालाओं में पशुओं के प्रति प्रतारण को रोकने के लिए यह दिवस आयोजित किया जाता है।

25 अप्रैल - विश्व मलेरिय दिवस वर्ष 2001 से अफ्रीका मलेरिया दिवस के रूप में मनाया जाता था लेकिन बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2008 से नाम बदलकर विश्व मलेरिया दिवस अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है l विश्व के लोगों को मलेरिया के प्रति जागरूकता व रोकथाम को बढावा देने हेतु प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है l,25 अप्रैल विश्व पशु चिकित्सा दिवस

26 अप्रैल विश्व बौद्धिक संपदा दिवस,26 अप्रैल - विश्व बौद्धिक संपदा अधिकार दिवस

28 अप्रैल काम पर सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए विश्व दिवस

29 अप्रैल अंतर्राष्ट्रीय डांस दिवस

30 अप्रैल विश्व पशु चिकित्सा दिवस,अप्रैल का अंतिम शनिवार - विश्व पशु चिकित्सा दिवस








मन्दिर में ध्वजा  और उसका महत्व 

बृजेश शुक्ल 

सनातन हिन्दू धर्म में ऐसा माना जाता है कि बिना ध्वजा (ध्वज, पताका, झण्डा) के मन्दिर में असुर निवास करते है इसलिए मन्दिर में सदैव ध्वजा लगी होनी चाहिए । सनातन धर्म की चार पीठों में से एक द्वारका पीठ भारत का एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहां पर 52 गज की ध्वजा दिन में तीन बार चढ़ाई जाती है । यह रक्षा ध्वज है जो मन्दिर और नगर की रक्षा करता है । ऐसा माना जाता है कि ध्वजा नवग्रह को धारण किये होती है, जो रक्षा कवच का काम करती है । मंदिर के शिखर पर लगभग 84 फुट लंबी विभिन्न प्रकार के रंग वाली, लहराती धर्मध्वजा को देखकर दूर से ही श्रीकृष्ण-भक्त उसके सामने अपना शीश झुका लेते हैं । कब से शुरु हुई मन्दिर में ध्वजा लगाने की परम्परा ? प्राचीनकाल में देवताओं और असुरों में भीषण युद्ध हुआ । उस युद्ध में देवताओं ने अपने-अपने रथों पर जिन-जिन चिह्नों को लगाया, वे उनके ध्वज कहलाये । तभी से ध्वजा लगाने की परम्परा शुरु हुई । जिस देवता का जो वाहन है, वही उनकी ध्वजा पर भी अंकित होता है । 

किस देवता की ध्वजा पर है कौन-सा चिह्न ?

प्रत्येक देवता के ध्वज पर उनको सूचित करने वाला चिह्न (वाहन) होता है । जैसे—

विष्णु—विष्णुजी की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज पीले रंग का होता है । उस पर गरुड़ का चिह्न अंकित होता है ।

शिव—शिवजी की ध्वजा का दण्ड चांदी का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर वृषभ का चिह्न अंकित होता है ।





ब्रह्माजी—ब्रह्माजी की ध्वजा का दण्ड तांबे का व ध्वज पद्मवर्ण का होता है । उस पर कमल (पद्म) का चिह्न अंकित होता है ।

गणपति—गणपति की ध्वजा का दण्ड तांबे या हाथीदांत का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर मूषक का चिह्न अंकित होता है ।

सूर्यनारायण—सूर्यनारायण की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज पचरंगी होता है । उस पर व्योम का चिह्न अंकित होता है ।

गौरी—गौरी की ध्वजा का दण्ड तांबे का व ध्वज बीरबहूटी के समान अत्यन्त रक्त वर्ण का होता है । उस पर गोधा का चिह्न होता है ।

भगवती/देवी/दुर्गा—देवी की ध्वजा का दण्ड सर्वधातु का व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर सिंह का चिह्न अंकित होता है ।

चामुण्डा—चामुण्डा की ध्वजा का दण्ड लोहे का व ध्वज नीले रंग का होता है । उस पर मुण्डमाला का चिह्न अंकित होता है ।

कार्तिकेय—कार्तिकेय की ध्वजा का दण्ड त्रिलौह का व ध्वज चित्रवर्ण का होता है । उस पर मयूर का चिह्न अंकित होता है ।

बलदेवजी—बलदेवजी की ध्वजा का दण्ड चांदी का व ध्वज सफेद रंग का होता है । उस पर हल का चिह्न अंकित होता है ।

कामदेव—कामदेव की ध्वजा का दण्ड त्रिलौह का (सोना, चांदी, तांबा मिश्रित)  व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर मकर का चिह्न अंकित होता है ।

यम—यमराज की ध्वजा का दण्ड लोहे का व ध्वज कृष्ण वर्ण का होता है । उस पर महिष (भैंसे) का चिह्न अंकित होता है ।

इन्द्र—इन्द्र की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज अनेक रंग का होता है । उस पर हस्ती (हाथी) का चिह्न अंकित होता है ।

अग्नि—अग्नि की ध्वजा का दण्ड सोने का व ध्वज अनेक रंग का होता है । उस पर मेष का चिह्न अंकित होता है ।

वायु—वायु की ध्वजा का दण्ड लौहे का व ध्वज कृष्ण वर्ण का होता है । उस पर हरिन का चिह्न अंकित होता है ।

कुबेर—कुबेर की ध्वजा का दण्ड मणियों का व ध्वज लाल रंग का होता है । उस पर मनुष्य के पैर का चिह्न अंकित होता है ।

वरुण की ध्वजा पर कच्छप चिह्न होता है।

ऋषियों की ध्वजा पर कुश का चिह्न अंकित होता है।

प्राय: लोग किसी मनोकामना पूर्ति के लिए हनुमानजी या देवी के मन्दिर में ध्वजा लगाने की मन्नत रखते 





हैं । हनुमानजी व देवी की पूजा बिना ध्वजा-पताका के पूरी नहीं होती है । देवी का तो पौषमास की शुक्ल नवमी को ध्वजा नवमी व्रत होता है जिसमें उनको ध्वजा अर्पण की जाती है।

प्रश्न यह है कि मन्दिर में ध्वजारोपण से कैसे हमारी मनोकामना पूरी हो जाती है ? इसका उत्तर हमें नारद-विष्णु पुराण में मिलता है जिसमें कहा गया है कि—

भगवान विष्णु के मन्दिर में ध्वजा चढ़ाने का महत्व यह है कि जितने क्षणों तक ध्वजा की पताका वायु के वेग से फहराती है, ध्वजा चढ़ाने वाले मनुष्य की उतनी ही पापराशियां नष्ट हो जाती हैं । जब पाप नष्ट हो जाते हैं तो पुण्य का पलड़ा भारी हो जाता है और मनुष्य की मनचाही वस्तु उसे प्राप्त हो जाती है । मन्दिर में ध्वजा चढ़ाने से मनुष्य की सम्पत्ति की सदा वृद्धि होती रहती है ।ध्वजारोपण से मनुष्य इस लोक में सभी प्रकार के सुख भोग कर परम गति को प्राप्त होता है । जिस प्रकार मन्दिर की ध्वजा दूर से ही दिखाई पड़ जाती है, उसी प्रकार ध्वज अर्पण करने से मनुष्य हर क्षेत्र में विजयी होता है और उसकी यश-पताका चारों ओर फहराती है । ध्वजारोपण के लिए पहले सुन्दर ध्वजा का निर्माण करायें । फिर शुभ मुहुर्त में जिस देवता को ध्वजा चढ़ानी है, उन भगवान का पूजन करें । इसके बाद ध्वजा का पंचोपचार (रोली, चावल, पुष्प, धूप-दीप और नैवेद्य से) पूजन करें । फिर ब्राह्मण द्वारा स्वस्तिवाचन करा कर मंगल वाद्य आदि बजाकर उसका मन्दिर में आरोहण करें । हो सके तो उस देवता के मन्त्र से 108 आहुति का हवन करें । ब्राह्मण को वस्त्र दक्षिणा देकर भोजन करायें

भगवान महावीर

भगवान महावीर ने धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक बल दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था।






डर

आज उसका जनाना उठ रहा है

जी हाँ ! कल वो गुज़र गया

पहुँच गया उस मुक़ाम पर 

जो बिन चाहे मिल जाता है ।

उसे कंधों पर उठा लिए जा रहे हैं

शीघ्र ही शीघ्र  भस्म कर देंगे 

उस नश्वर शरीर को

मौन होकर अवाक घूरेंगे उस आग को

जिसमें वो जल गया ,अब ख़ाक हो गया।

लौट आएँ है वहाँ से सभी

गहरी सोच में डूबे हैं

अब सभी गमगीन हैं ।

उसकी मौत के ग़म से नहीं

बस अपनी मौत के डर से।

 इंदिरा वेद






  ईश्वर का प्रमाण 

एक दिन एक राजा ने अपने सभासदों से कहा, ‘क्या तुम लोगों में कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है ?’ सभासद सोचने लगे... अंत में एक मंत्री ने कहा, ‘महाराज, मैं कल इस प्रश्न का उत्तर लाने का प्रयास करूंगा।’ सभा समाप्त होने के बाद उत्तर की तलाश में वह मंत्री अपने गुरु के पास जा रहा था। रास्ते में उसे गुरुकुल का एक विद्यार्थी मिला। मंत्री को चिंतित देख उसने पूछा, ‘सब कुशल मंगल तो है ? इतनी तेजी से कहां चले जा रहे हैं ?’ मंत्री ने कहा, ‘गुरुजी से ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण पूछने जा रहा हूं।’विद्यार्थी ने कहा, ‘इसके लिए गुरुजी को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है ? इसका जवाब तो मैं ही दे दूंगा।’ अगले दिन मंत्री उस विद्यार्थी को लेकर राजसभा में उपस्थित हुआ और बोला,‘महाराज यह विद्यार्थी आपके प्रश्न का उत्तर देगा।’ विद्यार्थी ने पीने के लिए एक कटोरा दूध मांगा। दूध मिलने पर वह उसमें उंगली डालकर खड़ा हो गया। थोड़ी-थोड़ी देर में वह उंगली निकालकर कुछ देखता, फिर उसे कटोरे में उंगली डालकर खड़ा हो जाता। जब काफी देर हो गई तो राजा नाराज होकर बोला, ‘दूध पीते क्यों नहीं? उसमें उंगली डालकर क्या देख रहे हो?’ विद्यार्थी ने कहा, ‘सुना है, दूध में मक्खन होता है, वही खोज रहा हूं।’ राजा ने कहा, ‘क्या इतना भी नहीं जानते कि दूध उबालकर उसे बिलोने से मक्खन मिलता है।’ विद्यार्थी ने मुस्कराकर कहा, ‘हे राजन, इसी तरह संसार में ईश्वर चारों ओर व्याप्त है, लेकिन वह मक्खन की भांति अदृश्य है..उसे तप से प्राप्त किया जाता है।’ राजा ने संतुष्ट होकर पूछा,‘अच्छा बताओ कि ईश्वर करता क्या है ?’ विद्यार्थी ने प्रश्न किया, ‘गुरु बनकर पूछ रहे हैं या शिष्य बनकर?’  राजा ने कहा, ‘शिष्य बनकर।’ विद्यार्थी बोला, ‘यह कौन सा आचरण है ? शिष्य सिंहासन पर है और गुरु जमीन पर।’ राजा ने झट विद्यार्थी को सिंहासन पर बिठा दिया और स्वयं नीचे खड़ा हो गया। तब विद्यार्थी बोला, ‘ईश्वर राजा को रंक और रंक को राजा बनाता है।’

शिक्षा : ईश्वर की प्राप्ति केवल सच्ची श्रद्धा और भक्ति के द्वारा संभव है..!!






बुद्ध ने अपने बेटे राहुल को भिक्षा पात्र दिया

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बेटा राहुल एक ही दिन का था। जब आए तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्नी यशोधरा बहुत नाराज थी। स्वभावत:। और उसके एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा। उसने पूछा कि मैं इतना जानना चाहती हूं; क्या तुम्हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं? क्या तुम सोचते हो कि मैं तुम्हें रोक लेती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्हें भेज सकते है, तो सत्य की खोज पर नहीं भेज सकते?*

*तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्लाती हूं, रूकावट डालती हूं। कहते है बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए। जवाब न दे पाये। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था? यह भी भगवान बुद्ध कैसे कहें कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्योंकि सत्य तो सभी जगह है। और भ्रम वश कोई अंजान कह दे तो भी कोई बात मानी जाये, अब तो उन्होंने खुद सत्य को जान लिया है, कि वह जंगल में मिल सकता है, तो क्या बाजार में नहीं मिल सकता। पहले बाजार में थे तब तो लगता था सत्य तो यहां नहीं है। वह तो जंगल में ही है। वह संसार में कहां वह तो संसार के छोड़ देने पर ही मिल सकता है। पर सत्य के मिल जाने के बात तो फिर उसी संसार और बाजार में आना पड़ा तब जाना यहां भी जाना जा सकता था सत्य का नाहक भागे। पर यहां थोड़ा कठिन जरूर है, पर ऐसा कैसे कह दे की यहां नहीं है। वह तो 






सब जगह है। भगवान बुद्ध के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने आंखे झुका ली। और 

तीसरा प्रश्न जो यशोदा ने चोट की, शायद यशोधरा समझ न सकी की बुद्ध पुरूष का यूं चुप रह जाना अति खतरनाक है। उस पर बार-बार चोट कर अपने आप को झंझट में डालने जैसा है, बुद्धों के पास क्या होता है। ध्यान-ध्यान-ध्यान और सन्यास। सो इस आखरी चोट में यशोदा उलझ गई। तीसरी बात उसने कही, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता है। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़ा है, हाथ में भिक्षा पात्र लिए। यही है तेरे पिता। ये तुझे पैदा होने के दिन छोड़ कर कायरों की तरह भाग गये थे। अंधेरे में अपना मुहँ छूपाये। जब तू मात्र के एक दिन का था। अभी पैदा हुआ नवजात। अब ये लौटे है, तेरे पिता, देख ले इन्हें जी भर कर। शायद फिर आये या न आये। तुझे मिले या न मिले। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्या है इनके पास देने के लिए। वह मांग ले। यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था ही क्या। यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। उसके ह्रदय के घाव जो नासूर बन गये थे। बह रहा था पीड़ा और संताप का मवाद। नहीं सूखा था वो जख्म जो बुद्ध उस रात दे कर चले गये थे। लेकिन उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ये घटना कोई नया मोड़ ले लेगी। वह तो भाव में बही जा रही थी। बात को इतने आगे तक खींच लिया था अब उस का तनाव उसकी तरफ वापस लौटेगा। इस की और उसका ध्यान गया ही नहीं। भगवान जो इतनी देर से शांत बैठे थे उनके चेहरे पर मंद हंसी आई, यशोधरा का क्रोध और भभक उठा। उसे इस बात का एहसास भी नहीं हो रहा था कि वह बंद रही है मकड़ी की तरह अपने ही ताने बाने में। भगवान ने तत्क्षण अपना भिक्षा पात्र सामने खड़े राहुल के हाथ में दे दिया। यशोधरा कुछ कहें या कुछ बोले। यह इतनी जल्दी हो गया। कि उसकी कुछ समझ में नहीं आया। इस के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था। भगवान ने कहा, बेटा मेरे पास देने को कुछ और है भी नहीं, लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूँगा। जिस सब के लिए मैने घर बार छोड़ा तुझे, तेरी मां, और इस राज पाट को छोडा़, और आज मुझे वो मिल गया है। मैं खुद चाहूंगा वही मेरे प्रिय पुत्र को भी मिल जाये। बाकी जो दिया जा सकता है। क्षणिक है। देने से पहले ही हाथ से फिसल जाता हे। बाकी रंग भी कोई रंग है। संध्या के आसमान की तरह, जो पल-पल बदलते रहते है। में तो तुझे ऐसे रंग में रंग देना चाहता हूं जो कभी नहीं छुट सकता। तू संन्यस्त हो जा।

बारह वर्ष के बेटे को संन्यस्त कर दिया। यशोधरा की आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे। उसने कहा ये आप क्या कर रहे है। पर बुद्ध ने कहा, जो मेरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और बांटने का ढंग संन्यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊँ। अब राहुल तो गया। तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं। उसकी तू भी मालिक हो जा। और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध कर दिया कि वह क्षत्राणी थी। तत्क्षण पैरों में झुक गई और उसने कहा, मुझे भी दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्लेख नहीं है। पूरे धम्म पद में कोई उल्लेख नहीं आता। हजारों संन्यासियों कि भीड़ में 





अपने को यूँ मिटा दिया। जैसे वो है ही नहीं। लोग उसके त्याग को नहीं समझ सकते। अपने मान, सम्मान, अहंकार को यूं मिटा दिया की संन्यासी भूल ही गये की ये वही यशोधरा है। भगवान बुद्ध की पत्नी। बहुत कठिन तपस्या थी यशोधरा की। पर वो उसपर खरी उतरी। उसकी अस्मिता यूं खो गई जैसे 

कपूर। बौद्ध शास्त्रों में इस घटना के बाद उसका फिर कोई उल्लेख नहीं आता। कैसे जीयी, कैसे मरी, कब तक जीयी, कब मरी, किसी को कुछ पता नहीं। हां राहुल का जरूर जिक्र आता है बौद्ध शास्त्रों में जब उसे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ, शायद वह सोलह साल का था। उस रात उसे मार ने डराया, वह संन्यासियों की कतार में बहुत दूर सोता था। एक साधारण सन्यासी की तरह। उस रात वह जब मार ने उसे डराया, तब वह गंध कुटी के बाहर आ कर सो गया। भगवान बुद्ध की कुटिया को गंध कुटी कहते थे। उसी रात राहुल ब्रह्म ज्ञान को उपलब्ध हुआ। मात्र राहुल का भी बौद्ध ग्रंथों में यही वर्णन आता है। कठिन था जीवन, रोज-रोज भिक्षा मांग कर खानी होती थी। और जब आप अति विशेष हो तो आपको अपनी अति विशेषता को छोड़ना अति कठिन है। यशोधरा और राहुल ने छोड़ा, उन संन्यासियों की भिड़ में ऐसे गुम हो गये। यूं लीन हो गये, यूं डूब गये, इसको कहते है ज्ञान। कि आने के पद चाप भी आप न देख सके कोई ध्वनि भी न हुई, कोई छाया तक नहीं बनी। तभी कोई अपने घर आ सकता है। बेण्ड बाजा बजा कर केवल आने का भ्रम पैदा कर देना है।

आदि शंकर ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। भगवद्गीता, उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने सांख्य दर्शन का प्रधानकारणवाद और मीमांसा दर्शन के ज्ञान-कर्मसमुच्चयवाद का खण्डन किया।

आदि शंकराचार्य





दिनांक 

भारतीय व्रत उत्सव अप्रैल - 2023 

1  

कामदा एकादशी व्रत

3  

सोम प्रदोष व्रत   

महावीर जयंती 

5  

सत्य व्रत, पूर्णिमा, 

श्री गणेश चतुर्थी व्रत

11 

गुरु तेग बहादुर जयंती 

12 

गुरु अर्जुन देव जयंती 

13  

कालाष्टमी 

14  

मकर संक्रांति पुन्य,वैशाखी ,अम्बेडकर जयंती 

16   

बरुधिनी एकादशी व्रत    

17 

सोम प्रदोष व्रत,

18 

मास शिवरात्रि    

20 

अमावस्या 

22 

परशुराम जयंती   

23 

अक्च्या  तीज 

24    

विनायक  चतुर्थी  व्रत  

25 

आध्य जगतगुरु शंकराचार्य जयंती  

26  

श्री रामानुजाचार्य जयंती 

27 

गंगा सप्तमी 

28 

श्री दुर्गा अष्टमी 

29 

सीतानवमी 






पंचक विचार अप्रैल - 2023   

पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 15 को 18 - 43 से 19 को 23 - 52 बजे तक पंचक है | 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

भद्रा विचार अप्रैल - 2023  

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक 

शुरू 

दिनांक 

समाप्त 

01

15-11

02

04-20

05

09-19

05

21-41

08

21-52

09

09-35

12

05-39

12

16-44

15

10-00

15

20-45

18

13-27

18

23-56

23

21-06

24

08-25

27

13-39

28

02-50





मूल नक्षत्र विचार अप्रैल -2023 



दिनांक

शुरू 

दिनांक

समाप्त 

01

01-56

03

07-23

10

13-39

12

11-58

19

01-00

20

23-10

28

09-52

30

15-30


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सर्वार्थ सिद्धि योग अप्रैल -2022

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

06

11-22

07

06-10

08

06-07

08

13-58

10

06-05

10

13-39

14

09-14

15

07-35

18

06-56

19

01-00

20

05-54

20

23-10

22

23-23

23

05-51

24

05-50

25

02-07

27

05-48

28

05-47




सुर्य उदय- सुर्य अस्त मार्च -2023 


दिनांक

उदय 

दिनांक

अस्त 

06-12

1

18-38

5

06-08

5

18-40

10

06-02

10

18-43

15

05-57

15

18-46

20

05-52

20

18-49

25

05-47

25

18-52

30

05-42

30

18-54

 

 अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें - शर्मा जी - 9560518227

ग्रह स्थिति अप्रैल - 2023 

ग्रह स्थिति - दिनांक 06 को शुक्र वर्षभ में,दिनाक 14 को सूर्य मेष में,दिनांक 21 को बुध वक्री, दिनांक 21 को गुरु मेष में,दिनांक 24 को बुध पश्चिम अस्त,दिनांक 29  को गुरु उदय 

चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त देखकर कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है। एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है|

राहू काल 


 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227








  मांगलिक दोष विचार परिहार

वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |

स्वयं सिद्ध मुहूर्त

 स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।

गुरु अर्जुन देव

गुरु अर्जुन देव सिखों के 5वें गुरु थे। गुरु अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंज हैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रन्थ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है।


 बरुधिनी एकादशी 

वरुथिनी एकादशी व्रत वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी  को वरुथिनी एकादशी कहते हैं।हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है और हर महीने में एकादशी तिथि दो बार पड़ती है। पूरे साल में 24 एकादशी तिथियां होती हैं और जिस साल मलमास होता है उस साल में एकादशी तिथियों की संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी व्रत का अपना अलग महत्व है और इसमें पूरी श्रद्धा भाव से विष्णु पूजन करने का विधान है। इन्हीं एकादशी तिथियों में से एक है वैशाख के महीने में पड़ने वाली *वरुथिनी एकादशी* जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।एकादशी के व्रत को मोक्षदायक माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है एवं मृत्यु के बाद उन्हें श्री विष्णु लोक प्राप्त होता है

वरुथिनी एकादशी कथा व वरुथिनी एकादशी पूजा विधि

वरुथिनी एकादशी के दिन कुछ लोग निर्जला व्रत भी करते हैं और कुछ लोग फलाहार का पालन करते हैं। यदि आप इस व्रत का पालन करते हैं तो सुबह जल्दी उठकर स्नान ध्यान से निवृत्त होकर घर के मंदिर की सफाई करें। पूजा स्थल को साफ़ करने के बाद सभी भगवानों को स्नान करें और नए वस्त्र पहनाएं। भगवान विष्णु की तस्वीर साफ़ करें और उसमें चन्दन लगाएं।

विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। रात्रि के समय भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करें और घर की शांति की प्रार्थना करें। पूरे दिन फलाहार का पालन करने के बाद द्वादशी के दिन व्रत का पारण करें। इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वास्तव में वरुथिनी एकादशी का व्रत और पूजन विशेष रूप से फलदायी है। इसलिए मनोकामनाओं को पूर्ति हेतु इस व्रत का पालन करें।




धर्मराज युधिस्टर हे भगवान वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी क्या विधि है और उससे करने से कौन से फल की प्राप्ति होती है, सो कृपा पूर्वक कहिए | श्री कृष्ण भगवान बोले राजेश्वर वैशाख  माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम बरूथिनी है। यह सौभाग्य को देने वाली है इस के व्रत से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में सुख भोग कर मोक्ष की  प्राप्ति होती  है। यदि इस व्रत को एक अभागिनी स्त्री करती है तो उसे सौभाग्य मिलता है एकादशी के प्रभाव से ही राजा मधांता  सब कष्ट को छोड़कर स्वर्ग  को गया इसकी कथा इस प्रकार है पुराने समय की बात है एक बार नर्मदा नदी के तट पर मधांता नामक राजा राज्य सुख भोग रहा था राज कार्य करते हुए भी वह अत्यंत तपस्वी था। एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा थोड़ी देर बाद वह राजा को घसीट  कर वन में ले गया तब राजा ने घबराकर तापस धर्म के अनुसार हिंसा क्रोध ना करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की हे भक्तवत्सल भगवान प्रकट हो और मेरी रक्षा करें राजा की प्रार्थना सुनकर भक्तवत्सल भगवान प्रकट हुए और भालू को अपने चक्र से मार डाला राजा का पैर भालू खा चुका था। इससे वह बहुत दुखी होकर विलाप करने लगा । विष्णु भगवान ने उसको दुखी देखकर कहा कि हे वत्स  मथुरा में जाकर तू मेरे वाराह अवतार मूर्ति की पूजा कर और वरुथिनी एकादशी का व्रत करो उसके प्रभाव से तुम  फिर से ठीक हो जाओगे। ओर यह जो भालू ने जो तुम्हें काटा है वह तुम्हारा पूर्व जन्म का अपराध है, राजा ने इस व्रत का अपार श्रद्धा से पालन किया। व्रत के प्रभाव से वह फिर  सुंदर शरीर पा गया जो इस एकादशी का व्रत करता है उसे कन्यादान के समान फल मिलता है एकादशी के दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए, दूसरों की चुगली नहीं करनी चाहिए, पापियों से बात नहीं करना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, प्रयास करें कि व्रत  करें एक समय खाना खाएं | द्वादशी को  भगवान को खीर का भोग लगाकर खुद व्रत को खोलें |

वल्लभाचार्य 16वीं सदी के एक संत थे जिन्हें हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है। 




कामदा एकादशी 

चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। साल में कुल 24 एकादशी पड़ती है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन पूरे विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन भक्त पूरे दिन फलाहार करते हुए व्रत करता है।

साथ ही भगवान विष्णु की पूजा तथा आरती की जाती है। ऐसी मान्यता है कि व्रत वाले दिन व्रत की कथा का श्रवण जरूर करना चाहिए। इसके प्रभाव से व्रत का फल प्राप्त होता है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। कामदा एकादशी के दिन इससे जुड़ी पौराणिक व्रत कथा का पाठ जरूर करें।

कामदा एकादशी व्रत कथा

प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहां पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नामक एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गन्धर्व रहते थे। उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहां तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो उठते थे।

एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसको अपनी प्रिय ललिता का ध्यान आ गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। तब पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक कहा कि तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है। अत: तू कच्चा मांस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बनकर अपने किए कर्म का फल भोग पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विशाल राक्षस बन गया। उसका मुख अत्यंत भयंकर, नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकलने लगी। उसकी नाक पर्वत की कंदरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पर्वत के समान लगने लगी। सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगने 





लगे तथा भुजाएं अत्यंत लंबी हो गईं। इस प्रकार राक्षस बनकर वह अनेक प्रकार के दुःख भोगने लगा।

जब उसकी प्रियतमा ललिता को इस घटना की जानकारी मिली तो वह बहुत दुखी हुई और वह अपने पति के उद्धार का उपाय सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के घोर दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री उसके पीछे-पीछे जाती और विलाप करती रहती। एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुंच गई, जहां पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहां जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी।उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले कि हे सुभगे! तुम कौन हो और यहां किस लिए आई हो? ‍ललिता बोली कि हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से विशालकाय राक्षस हो गया है। इसका मुझको महान दुःख है। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए। श्रृंगी ऋषि बोले हे गंधर्व कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा।

मुनि के ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी - हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए। एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए।

इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है। संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

एकादशी की उत्पत्ति भगवान विष्णु से हुई थी, जो राक्षस मुरा को मारने के लिए थी, जो सोते हुए भगवान विष्णु को मारने का इरादा रखता था। देवी एकादशी भगवान विष्णु की सुरक्षात्मक शक्ति है और देवी वैष्णवी भगवान विष्णु की एक और शक्ति है और सप्त मातृका का एक हिस्सा है।हिंदू पञ्चाङ्ग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है। एक पूर्णिमा होने पर और दूसरी अमावस्या होने पर। पूर्णिमा से आगे आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के उपरान्त आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। एकादशी व्रत के करने के 26 फायदे हैं- व्यक्ति निरोगी रहता है, राक्षस, भूत-पिशाच आदि योनि से छुटकारा मिलता है, पापों का नाश होता है, संकटों से मुक्ति मिलती है, सर्वकार्य सिद्ध होते हैं, सौभाग्य प्राप्त होता है, मोक्ष मिलता है, विवाह बाधा समाप्त होती है, धन और समृद्धि आती है, शांति मिलती है, मोह-माया और बंधनों से 








 भारत में सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार

डॉक्टर अनिश द्विवेदी 

यह लेख (बिल्कुल सत्य) लिखने का विचार कुछ दिन पहले ही आया था। लेकिन फिर अन्य कामों के कारण याद नहीं रहा। अभी एक घटना और घटी तो सोचा- चलो लिख ही दें। और लोग भी तो इस बारे में सोचें। हुआ ऐसा था- एक सरकारी विभाग न जाने क्या सोचकर, एक संग्रहालय बनाने जा रहा था। पता नहीं क्यों और कैसे, हमें बुलाया गया। कुछ अनोखे वार्तालाप हुये। हमने सुझाव दिया कि- किले से बाहर शहर का पहला राजमहल बहुत खंडहर और दयनीय स्थिति में है। जवाब आया- हम केवल वो काम करते हैं जहाँ से रैवेन्यू मिले। हम चुप रहे। वे फिर बोले- इतिहास ऐसा लिखिये कि किसी को ठेस नहीं लगे। हमने कहा- साहब इतिहास मतलब होता है "भूतकाल"। जिसे ब्रह्मांड की कोई शक्ति बदल नहीं सकती है। इसीलिये भूतकाल(इतिहास) को तो जो हुआ था वही लिखा जायेगा।

तुरंत एक सज्जन ने फरमाया। इनकी एक इतिहासकार के रूप की सरकारी मान्यता देखी जाये।

हमने पूछा "सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार" का क्या अधिकृत सिस्टम है ?

तबसे फिर हमारे पास कोई जवाब नहीं आया। बाद में मालूम हुआ, विभाग को कोई वरिष्ठ और अनुकूल और सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार मिल गये थे।

अब बाद वाली घटना- हुआ यूं कि हमने एक पोस्ट लिखी थी। *सच इतिहास और सच समयकाल जाने बिना पुरातत्व उत्खनन के परिणाम केवल अंग्रेजों के लेखन के आधार पर घोषित नहीं करने चाहिये। नहीं तो गलत फैलता है। लाखों में वेतन प्राप्त एक सरकारी विद्वान तुनक गये। बोले- आप किसी पर उंगली  गलत उठा रहे हैं। हमने कहा- साहब स्पष्ट करें। गलत क्या है ? सरकारी विद्वान बोले- उत्खनन करनेवाला सब जानता है। वो जो बताता है, बिल्कुल सच होता है।हमने कहा- *साहब आप केवल लेयर 




से समयकाल की घोषणा कर देते हैं। जो अंग्रेज बता गये थे। जिसकी सच से बहुत दूरी है। पुरातत्व से आज तक इतिहास के कितने सच संपूर्ण आये हैं? उत्खनन, सिक्के, मूर्ति, वास्तु, अभिलेख आदि केवल सच इतिहास का ज्ञान होने पर साक्ष्य भी प्रस्तुत करने में मदद कर सकते हैं। ये सच इतिहास नहीं बताते हैं। किसी भी अभिलेख या सिक्के पर मौर्य वंश का सच समय नहीं है। अंग्रेजों और उनके आप जैसे अनुयायियों ने मौर्यवंश का समय कैसे मान लिया? हमने सरकारी मान्यता प्राप्त एक इतिहासकार जो तथाकथित मौर्य विशेषज्ञ भी हैं, से पूछा है, आप भी बतायें। प्रसिद्ध अभिलेख, मौर्यवंश के हैं, कैसे माना,मौर्यकाल कैसे निर्धारित किया ? वे सरकारी विद्वान तब से गायब हैं और खफा हैं।

कुछ सच उदाहरण और प्रस्तुत हैं:-

एक सरकारी विद्वान हमसे बोले- इतिहास लिखते समय लोगों की आस्था का ध्यान रखना चाहिये।

हमने कहा- साहब इतिहास मतलब भूतकाल। जिसे "कोई भी" नहीं बदल सकता है। तो वो लोगों का ख्याल कैसे रखेगा। लोगों को भूतकाल का ख्याल रखना पड़ेगा। जो अच्छा हुआ था। उससे प्रेरणा लेकर हमेशा काम करें। जो गलत हूआ था, उससे सबक लेकर, गलती करने से बचे। मतलब भूतकाल(इतिहास) से सीख सकते हैं। बदल नहीं सकते हैं।

वे सरकारी विद्वान नाराज से रहने लगे थे। ऐसे ही एक सरकारी विद्वान मिले। जिन्हें 1857 का विशेषज्ञ कहा जाता था। हमने उनसे समय माँगा। हमें आधे घंटे का समय दिया गया। हमने समय की कीमत समझते हुये, केवल पाँच प्रश्न तैयार किये। पहला प्रश्न था कि यदि स्वतंत्रता संग्राम था तो आर्थिक, धार्मिक आदि आदि कारण क्यों? और यदि इतने सारे कारण थे तो स्वतंत्रता संग्राम कैसे? क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का तो एक ही कारण होता है- गुलामी से स्वतंत्रता। जैसा हमारे महान क्रांतिकारियों का था।

दूसरा प्रश्न था। जो कारण बताये जाते हैं। वे सब तो तात्कालिक थे। तात्कालिक कारण, इतना बड़ा महासंग्राम नहीं करवा सकते। इसका कोई मूल कारण और सोच रही होगी। वो क्या थे?

उन सरकारी विद्वान ने मात्र पाँच मिनट बाद ही सचमुच की दौड़ लगा दी। फिर दोबारा बात ही नहीं की। एक सरकारी विद्वान हमें एक अंग्रेज अधिकारी की (तथाकथित) डायरी दिखाने के लिये सालभर चक्कर लगवाते रहे। लेकिन ऐसा कुछ हो तो दिखाते। खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

आपको याद होगा। कुछ माह पहले एक महान ऐतिहासिक राजा को लेकर विवाद छिड़ा था। इतिहास विषय से भारत की सबसे कठिन प्रतियोगिता पास लोग कुछ समझ नहीं पाये। तो उन्हें सरकारी मान्यता प्राप्त विद्वान इतिहासकार याद आयें। दो को सबसे बेहतर समझा गया। वो सबसे बेहतर, सरकारी मान्यता प्राप्त सरकारी विद्वान इतिहासकार आजतक (एक साल से ज्यादा समय में) अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाये हैं। मजेदार बात ये हैं कि उन सरकारी मान्यता प्राप्त विद्वान इतिहासकारों को भारत के प्राचीन इतिहास का सच समयकाल तक नहीं मालूम है। ये सरकारी मान्यता प्राप्त सरकारी इतिहासकार या पुरातत्वविद, 1947 से आजतक, अंग्रेजों से हटकर कितनी खोजें कर पाये हैं? जिन्हें 




सरकारी पाठनसामग्री या पाठ्यक्रम में शामिल किया गया हो? लेकिन निजी तौर पर बहुत काम किये जा चुके हैं। भारत में दुर्भाग्य ये है कि सच को मान्यता देने का काम सरकारी मान्य इतिहासकार करते हैं। जो अपने पढ़े को गलत कैसे बतायेंगे? 

और पाठनसामग्री में शामिल सरकारी इच्छा करती है। जबकि भारत में इतिहास लेखन केवल वोट बैंक पर आधारित होता है। उसका सच या वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता है। ऐसे सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकारों के बहुत से सच उदाहरण हैं। इससे तो जो सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं हैं। या शौकिया लेकिन वास्तविक रुचि इतिहास संबंधित विषयों में रखते है। वे ईमानदार, सहयोगी, विश्वसनीय, ज्यादा होते हैं। इसीलिये हम सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार बनना भी नहीं चाहते हैं। वैसे भारत में सरकारी मान्यता प्राप्त इतिहासकार या पुरातत्वविद्, वो है जिसके पास इतिहास या पुरातत्व विषय की सरकारी नौकरी हो। और जो सरकार की इच्छा अनुरूप ही इतिहास या पुरातत्व लिखता और फैलाता हो। वास्तविकता और सच से कोई मतलब नहीं होना चाहिये।

हिन्दी लेखक परिवार से साभार 


रामानुजाचार्य

रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। वह ऐसे वैष्णव सन्त थे जिनका भक्ति परम्परा पर बहुत गहरा प्रभाव रहा। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर, रैदास और सूरदास थे।





 मंदबुद्धि 

विद्यालय में सब उसे मंदबुद्धि कहते थे। उसके गुरुजन भी उससे नाराज रहते थे क्योंकि वह पढने में बहुत कमजोर था और उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी कम था। कक्षा में उसका प्रदर्शन हमेशा ही खराब रहता था और बच्चे उसका मजाक उड़ाने से कभी नहीं चूकते थे। पढने जाना तो मानो एक सजा के समान हो गया था, वह जैसे ही कक्षा में घुसता और बच्चे उस पर हंसने लगते, कोई उसे महामूर्ख तो कोई उसे बैलों का राजा कहता, यहाँ तक की कुछ अध्यापक भी उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते । इन सबसे परेशान होकर उसने स्कूल जाना ही छोड़ दिया।

अब वह दिन भर इधर-उधर भटकता और अपना समय बर्बाद करता। एक दिन इसी तरह कहीं से जा रहा था , घूमते – घूमते उसे प्यास लग गयी । वह इधर-उधर पानी खोजने लगा। अंत में उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह वहां गया और कुएं से पानी खींच कर अपनी प्यास बुझाई। अब वह काफी थक चुका था, इसलिए पानी पीने के बाद वहीं बैठ गया। तभी उसकी नज़र पत्थर पर पड़े उस निशान पर गई जिस पर बार-बार कुएं से पानी खींचने की वजह से रस्सी का निशाँ बन गया था। वह मन ही मन सोचने लगा कि जब बार-बार पानी खींचने से इतने कठोर पत्थर पर भी रस्सी का निशान पड़ सकता है तो लगातार मेहनत करने से मुझे भी विद्या आ सकती है। उसने यह बात मन में बैठा ली और फिर से विद्यालय जाना शुरू कर दिया। कुछ दिन तक लोग उसी तरह उसका मजाक उड़ाते रहे पर धीरे-धीरे उसकी लगन देखकर अध्यापकों ने भी उसे सहयोग करना शुरू कर दिया। उसने मन लगाकर अथक परिश्रम किया। कुछ सालों बाद यही विद्यार्थी प्रकांड विद्वान वरदराज के रूप में विख्यात हुआ, जिसने संस्कृत में मुग्धबोध और लघुसिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथों की रचना की।”

अच्छी परवरिश

डॉ ममता

उस दिन की पूरी रात मैं सो नही पाई। रात भर अपने आप को कोश रही थी की क्यों मेने जॉब ज्वाइन नही किया। क्या बच्चे को पालने की जिम्मेदारी बस औरत की ही होती हैं? मेने अपना करियर दाव पर लगा रखा हैं ,ये पार्ट टाइम जॉब करके।इतनी पढ़ाई ही क्यों की जब ये सब ही करना था। उस दिन की रात सबसे लंबी थी। शायद एक बहुत बड़ा चेंज आने वाला था।

असल में उस दिन मेरे ६ साल के बेटे ने मुझे स्कूल से आते ही बोला.. मम्मा जल्दी से पानी लाओ, मैं बहुत थक गया हूं। मैं उसका बेग रख कर पानी लेने जा ही रही थी की वो चिल्ला कर फिर से बोला ,आपको समझ नही आ रहा क्या? मैं स्कूल से थका आया हूं और पानी ले कर नही आ रहे ।बच्चा थका हुआ हैं समझ कर मेने जल्दी से उसे पानी पिलाया। थोड़ी देर आराम करने के बाद यूनिफॉर्म बदलने को बोला पर वो गुस्से में बोला ...थका हुआ हूं, ६ घंटे स्कूल हो कर आया हूं,आपको क्याँ समझ आएगा ? आप तो घर में ही तो रहते हो।  मुझे उसका ये व्यवहार बिलकुल सही नही लगा। पर वो  सही समय नही था बात करने का,इसी लिए कुछ नही बोला। दूसरा बच्चा बहुत छोटा था ,कुछ नही समझेंगा।

शाम को उसके पापा के आने पर, वो फिर बोला ...मम्मा जल्दी पानी लाओ ।पापा आ गए। मेने पानी पिलाया। तो वो मजाक बनाने लगा की ...मम्मा तो कुछ करती नही पापा और देखो ! हम दोनो कितनी मेहनत कर रहे हैं। पतिदेव ने भी उसकी बातें सुनकर साथ में मजाक उड़ाया। उनको लगा छोटा बच्चा हैं ,छोड़ो बात को। पर मेरे दिल को तो बहुत चोट सी लगी थी।

मैं बेटे के होने के बाद से ही पार्ट टाइम जॉब कर रही थी क्योंकि मेरा बेटा बहुत ज्यादा ही चंचल था। 






मुझे किसी केयर टेकर पर कभी भरोसा नही था। मुझे लगा जब तक बेटा समझदार नही हो जाता, मैं पार्ट टाइम जॉब ही करूंगी। जो की उसके स्कूल टाइम में ही हो। पर मेरे लिए ये इतना आसान नहीं 

था। टाइम पर स्कूल से उसे लेना भी होता था। खाना बना कर जॉब पर जाना फिर जॉब से आकर फिर से काम पर लगना। 

वैसे अगर मैं जॉब नहीं भी कर रही होती तो भी वो इस तरह मुझसे बात नही कर सकता था। घर क्या बिना काम करें ही संभल जाता हैं।काम तो काम होता हैं चाहे आप घर में करो या बाहर जॉब पर जा कर करों। मन में सोच रही थी एक महीने के लिए सब छोड़ मम्मी के पास चली जाती हूं । हर काम की कामवाली लगाएंगे तब पता चलेगा। किसी और के हाथ का खाना खायेंगे तभी अक्ल आएंगी।फिर लगा एक महीने बाद आकार खुद ही घर साफ करना पड़ेगा। तो ये  सोल्यूशन तो सही नही हैं।

 मुझे ये अहसास हो रहा था कि मैं बच्चे को सही संस्कार नहीं दे पा रही हूं, ये मेरी ही गलती हैं। आगे जाकर ये अपनी पत्नी  का भी रेस्पेक्ट नही करेगा। लगा सब कुछ हाथ से निकल रहा हैं।फिर लगा अब अपनी इंपोर्टेंस भी बतानी होगी, नही तो मैं खुद खुश नही रह पाऊंगी। खुद खुश नही तो एक अच्छी मां भी नही बन पाऊंगी।

मेने इस बारे में पतिदेव से बात की । उन्होने अपने बिजी शेड्यूल से टाइम निकाल मुझे सहयोग देना शुरू किया।बेटे के सामने खुद पानी लेना, खुद अपनी खाने की प्लेट रखना, किचन में हेल्प करना , चादर खुद समेटना ,कभी कभी उसे स्कूल से लेना,ऐसे  बहुत से काम जो उसकी नजर में आए करना शुरू किया।  हम दोनो ने उसे कभी कुछ नहीं बोला। मैने भी उसके स्कूल के छुट्टी वाले दिन उसे हॉस्पिटल ले जाना शुरू किया। उसने देखा की मम्मा कितना काम करती है। 

घर आकर प्यार से उसे बोलती थी की चलो... अब हम दोनो मिल कर काम करेंगे। मम्मा भी तो थकी हुई हैं, उसे ये अहसास कराना शुरू किया कि मम्मा भी पूरे दिन ,पापा की तरह काम कर सकती है। पर आप अभी छोटे हो इसी लिए मम्मा आप का भी ध्यान रखती हैं। रात को सोते समय उसे अपने कॉलेज की और बचपन की बहुत सारी कहानियां सुनाती थी। अब जब वो बड़ा हो रहा हैं , मुझे सपोर्ट करता है कभी मैं लेट हो जाती हूं तो मासी (उसकी केयर टेकर ) से भी खाना खा लेता हैं। बहुत गर्व से बोलता है की मेरी मम्मा वर्किंग मदर हैं। मुझे अच्छा लगता हैं की शायद जिससे वो बड़े हो कर शादी करेगा उसे भी वो रेस्पेक्ट देगा और उसके साथ में मिल कर काम करेगा। देखते हैं ..कोशिश तो हैं एक अच्छी परवरिश देने की। आगे क्या होगा वो तो भगवान को ही पता हैं।

शिक्षा:- अपनी किसी भी कमजोरी पर जीत हांसिल कर सकते हैं, बस ज़रुरत है कठिन परिश्रम और धैर्य के साथ अपने लक्ष्य के प्रति स्वयं को समर्पित करने की।


पवनमुक्तासन

आयुर्वेद कहता है कि स्वस्थ शरीर के लिए वात,पित्त और कफ का संतुलन जरूरी है।जिनके संतुलन के लिए योगसन जरूरी है।

पवनमुक्तासन

पवनमुक्तासन के लाभ:

दूषित वायु को शरीर से बाहर निकाल कर शरीर को स्वस्थ बनाता है।वात के कारण होने वाली अकड़न जकड़न को दूर करता है।

कैसे करें:

1-किसी योगा मैट पर पीठ के बल लेट जाएं।

2-स्वांस लेते हुए दाहिने पैर को मोड़ कर हाथों की सहायता से सीने पर चिपकाएं।और नाक से घुटने को छूने का प्रयास करें।7 से 8 गहरी स्वांस लेते रहें।

3-धीरे धीरे पैर और गर्दन को अपने स्तिथि में वापस लायें।

4-यही क्रम बाएं पैर के साथ दोहराएं।

5-पुनः दोनों पैरों को एक साथ सीने से चिपका कर,घुटनों के बीच नाक को छूने का प्रयास करें।गहरी स्वांस के साथ।

6-दोनों पैरों को वापस लाकर कुछ पल  शव आसान में विश्राम करें।

इस क्रिया को 4-5 बार दुहराएं एक एक कर के दोनो पैरो से करे |






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